महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1505, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोकानृषींश्चापि पितॄन् प्रजाश्च । समासेन विधिवत्प्राणिलोकान् सर्वान् सदा भूतपतिः सिसृक्षुः ॥ ४२ ॥ राजन्! इन्होंने ही इस विश्वको उत्पन्न किया है और ये ही आत्मयोनि श्रीकृष्ण अपनी ही शक्तिसे सबको जीवन प्रदान करते हैं। देवता, असुर, मनुष्य, लोक, ऋषि, पितर, प्रजा और संक्षेपतः सम्पूर्ण प्राणियोंको इन्हींसे जीवन मिलता है। ये भगवान् भूतनाथ ही सदा विधिपूर्वक समस्त भूतोंकी सृष्टिकी इच्छा रखते हैं ॥ ४२ ॥
शुभाशुभं स्थावरं जङ्गमं च विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रतीहि । यद् वर्तते यच्च भविष्यतीह सर्वं ह्येतत् केशवं त्वं प्रतीहि ॥ ४३ ॥ शुभ-अशुभ और स्थावर-जंगमरूप यह सारा जगत् श्रीकृष्णसे उत्पन्न हुआ है, इस बातपर विश्वास करो। भूत, भविष्य और वर्तमान सब श्रीकृष्णका ही स्वरूप है। यह तुम्हें अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ॥ ४३ ॥
मृत्युश्चैव प्राणिनामन्तकाले साक्षात् कृष्णः शाश्वतो धर्मवाहः । भूतं च यच्चेह न विद्या किंचिद् विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ४४ ॥ प्राणियोंका अन्तकाल आनेपर साक्षात् श्रीकृष्ण ही मृत्युरूप बन जाते हैं। ये धर्मके सनातन रक्षक हैं। जो बात बीत चुकी है तथा जिसका अभी कोई पता नहीं है, वे सब श्रीकृष्णसे ही प्रकट होते हैं, यह निश्चितरूपसे जान लो ॥ ४४ ॥
यत् प्रशस्तं च लोकेषु पुण्यं यच्च शुभाशुभम् । तत्सर्वं केशवोऽचिन्त्यो विपरीतमतः परम् ॥ ४५ ॥ तीनों लोकोंमें जो कुछ भी उत्तम, पवित्र तथा शुभ या अशुभ वस्तु है, वह सब अचिन्त्य भगवान् श्रीकृष्णका ही स्वरूप है, श्रीकृष्णसे भिन्न कोई वस्तु है, ऐसा सोचना अपनी विपरीत बुद्धिका ही परिचय देना है ॥ ४५ ॥
एतादृशः केशवोऽतश्च भूयो नारायणः परमश्चाव्ययश्च । मध्याद्यन्तस्य जगतस्तस्थुषश्च बुभूषतां प्रभवश्चाव्ययश्च ॥ ४६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी ऐसी ही महिमा है। बल्कि ये इससे भी अधिक प्रभावशाली हैं। ये ही परम पुरुष अविनाशी नारायण हैं। ये ही स्थावर-जंगमरूप जगत्के आदि, मध्य और