महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1501, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंये यज्ञकर्ता श्रीकृष्ण प्रत्येक मासमें यज्ञ करते हैं। प्रत्येक यज्ञमें वेदज्ञ ब्राह्मण इन्हींके गुण गाते हैं। ये ही तीन नाभियों, तीन धामों और सात अश्वोंसे युक्त इस संवत्सर-चक्रको धारण करते हैं ।। २३ ।।
महातेजाः सर्वगः सर्वसिंहः कृष्णो लोकान् धारयते यथैकः । हंसं तमोध्नं च तमेव वीर कृष्णं सदा पार्थ कर्तारमेहि ।। २४ ।।
वीर कुन्तीनन्दन! ये महातेजस्वी और सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले सर्वसिंह श्रीकृष्ण अकेले ही सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं। तुम इन श्रीकृष्णको ही अन्धकारनाशक सूर्य और समस्त कार्योंका कर्ता समझो ।। २४ ।।
स एकदा कक्षगतो महात्मा तृप्तो विभुः खाण्डवे धूमकेतुः । स राक्षसानुरगांश्चावजित्य सर्वत्रगः सर्वमग्नौ जुहोति ।। २५ ।।
इन्हीं महात्मा वासुदेवने एक बार अग्निस্বরূপ होकर खाण्डव वनकी सूखी लकड़ियोंमें व्याप्त हो पूर्णतः तृप्तिका अनुभव किया था। ये सर्वव्यापी प्रभु ही राक्षसों और नागोंको जीतकर सबको अग्निमें ही होम देते हैं ।। २५ ।।
स एव पार्थाय श्वेतमश्वं प्रायच्छत् स एवाश्वानथ सर्वांश्चकार । स बन्धुरस्तस्य रथस्त्रिचक्र- स्त्रिवृच्छिराश्चतुरश्वस्त्रिनाभिः ।। २६ ।।
इन्होंने ही अर्जुनको श्वेत अश्व प्रदान किया था। इन्होंने ही समस्त अश्वोंकी सृष्टि की थी। ये ही संसाररूपी रथको बाँधनेवाले बन्धन हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही इस रथके चक्र हैं। ऊर्ध्व, मध्य और अधः—जिसकी गति है। काल, अदृष्ट, इच्छा और संकल्प—ये चार जिसके घोड़े हैं। सफेद, काला और लाल रंगका त्रिविध कर्म ही जिसकी नाभि है। वह संसार-रथ इन श्रीकृष्णके ही अधिकारमें है ।। २६ ।।
स विहायो व्यदधात् पञ्चनाभिः स निर्ममे गां दिवमन्तरिक्षम् । सोऽरण्यानि व्यसृजत् पर्वतांश्च हृषीकेशोऽमितदीप्ताग्नितेजाः ।। २७ ।।
पाँचों भूतोंके आश्रयरूप श्रीकृष्णने ही आकाशकी सृष्टि की है। इन्होंने ही पृथ्वी, स्वर्गलोक और अन्तरिक्षकी रचना की है, अत्यन्त प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी इन हृषीकेशने ही वन और पर्वतोंको उत्पन्न किया है ।। २७ ।।