महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1500, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्यान्तरिक्षं पृथिवी दिवं च सर्वं वशे तिष्ठति शाश्वतस्य । स कुम्भे रेतः ससृजे सुराणां यत्रोत्पन्नमृषिमाहुर्वसिष्ठम् ॥ १९ ॥ पृथ्वी, आकाश और स्वर्गलोक सभी इन सनातन पुरुष श्रीकृष्णके वशमें रहते हैं। इन्होंने कुम्भमें देवताओं (मित्र और वरुण)-का वीर्य स्थापित किया था; जिससे महर्षि वसिष्ठकी उत्पत्ति हुई बतायी जाती है ॥ १९ ॥
स मातरिश्वा विभुरश्ववाजी स रश्मिवान् सविता चादिदेवः । तेनासुरा विजिताः सर्व एव तद्विक्रान्तैर्विजितानीह त्रीणि ॥ २० ॥ ये ही सर्वत्र विचरनेवाले वायु हैं, तीव्रगामी अश्व हैं, सर्वव्यापी हैं, अंशुमाली सूर्य और आदि देवता हैं। इन्होंने ही समस्त असुरोंपर विजय पायी तथा इन्होंने ही अपने तीन पदोंसे तीनों लोकोंको नाप लिया था ॥ २० ॥
स देवानां मानुषाणां पितॄणां तमेवाहुर्यज्ञविदां वितानम् । स एव कालं विभजन्नुदेति तस्योत्तरं दक्षिणं चायने द्वे ॥ २१ ॥ ये श्रीकृष्ण सम्पूर्ण देवताओं, पितरों और मनुष्योंके आत्मा हैं। इन्हींको यज्ञवेत्ताओंका यज्ञ कहा गया है। ये ही दिन और रातका विभाग करते हुए सूर्यरूपमें उदित होते हैं। उत्तरायण और दक्षिणायन इन्हींके दो मार्ग हैं ॥ २१ ॥
तस्यैवोर्ध्वं तिर्यगधश्चरन्ति गभस्तयो मेदिनीं भासयन्तः । तं ब्राह्मणा वेदविदो जुषन्ति तस्यादित्यो भामुपयुज्य भाति ॥ २२ ॥ इन्हींके ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलमें पृथ्वीको प्रकाशित करनेवाली किरणें फैलती हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मण इन्हींकी सेवा करते हैं और इन्हींके प्रकाशका सहारा लेकर सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं ॥ २२ ॥
स मासि मास्यध्वरकृद् विधत्ते तमध्वरे वेदविदः पठन्ति । स एवोक्तश्चक्रमिदं त्रिनाभि सप्ताश्वयुक्तं वहते वै त्रिधाम ॥ २३ ॥