महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1508, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥ ७ ॥
अस्मिँल्लोके रौक्मिणेय तथामुष्मिंश्च पुत्रक ।
महाराज! प्रद्युम्नके ऐसा कहनेपर मैंने उसको उत्तर दिया। रुक्मिणीनन्दन! ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे क्या फल मिलता है, यह मैं बता रहा हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। बेटा! ब्राह्मणोंके राजा सोम (चन्द्रमा) हैं। अतः ये इस लोक और परलोकमें भी सुख-दुःख देनेमें समर्थ होते हैं ।। ६-७ १/२ ।।
ब्राह्मणप्रमुखं सौम्यं न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ ८ ॥
ब्राह्मणप्रतिपूजायामायुः कीर्तिर्यशो बलम् ।
लोका लोकेश्वराश्चैव सर्वे ब्राह्मणपूजकाः ॥ ९ ॥
ब्राह्मणोंमें शान्तभावकी प्रधानता होती है। इस विषयमें मुझे कोई विचार नहीं करना है। ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे आयु, कीर्ति, यश और बलकी प्राप्ति होती है। समस्त लोक और लोकेश्वर ब्राह्मणोंके पूजक हैं ।। ८-९ ।।
त्रिवर्गे चापवर्गे च यशःश्रीरोगशान्तिषु ।
देवतापितृपूजासु संतोष्याश्चैव नो द्विजाः ॥ १० ॥
धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये, मोक्षकी प्राप्तिके लिये और यश, लक्ष्मी तथा आरोग्यकी उपलब्धिके लिये एवं देवता और पितरोंकी पूजाके समय हमें ब्राह्मणोंको पूर्ण संतुष्ट करना चाहिये ।। १० ।।
तत्कथं वै नाद्रियेयमीश्वरोऽस्मीति पुत्रक ।
मा ते मन्युर्महाबाहो भवत्वत्र द्विजान् प्रति ॥ ११ ॥
बेटा! ऐसी दशामें मैं ब्राह्मणोंका आदर कैसे नहीं करूँ? महाबाहो! मैं ईश्वर (सब कुछ करनेमें समर्थ) हूँ—ऐसा मानकर तुम्हें ब्राह्मणोंके प्रति क्रोध नहीं करना चाहिये ।। ११ ।।
ब्राह्मणा हि महद्भूतमस्मिँल्लोके परत्र च ।
भस्म कुर्य्युर्जगदिदं क्रुद्धाः प्रत्यक्षदर्शिनः ॥ १२ ॥
ब्राह्मण इस लोक और परलोकमें भी महान् माने गये हैं। वे सब कुछ प्रत्यक्ष देखते हैं और यदि क्रोधमें भर जायँ तो इस जगत्को भस्म कर सकते हैं ।। १२ ।।
अन्यान्पि सृजेयुश्च लोकाँल्लोकेश्वरांस्तथा ।
कथं तेषु न वर्तेरन् सम्यग् ज्ञानात् सुतेजसः ॥ १३ ॥
दूसरे-दूसरे लोक और लोकपालोंकी वे सृष्टि कर सकते हैं। अतः तेजस्वी पुरुष ब्राह्मणोंके महत्त्वको अच्छी तरह जानकर भी उनके साथ सद्वर्ताव क्यों न करेंगे? ।। १३ ।।
अवसन्मद्गृहे तात ब्राह्मणो हरिपिङ्गलः ।
चीरवासा बिल्वदण्डी दीर्घश्मश्रुः कृशो महान् ॥ १४ ॥