भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1509, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1509

तात! पहलेकी बात है, मेरे घरमें एक हरित-पिंगल वर्णवाले ब्राह्मणने निवास किया था। वह चिथड़े पहिनता और बेलका डंडा हाथमें लिये रहता था। उसकी मूँछें और दाढ़ियाँ बढ़ी हुई थीं। वह देखनेमें दुबला-पतला और ऊँचे कदका था ॥ १४ ॥ दीर्घेभ्यश्च मनुष्येभ्यः प्रमाणादधिको भुवि । स स्वैरं चरते लोकान् ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ १५ ॥ इस भूतलपर जो बड़े-से-बड़े मनुष्य हैं, उन सबसे वह अधिक लंबा था और दिव्य तथा मानव लोकोंमें इच्छानुसार विचरण करता था ॥ १५ ॥ इमां गाथां गायमानश्चत्वरेषु सभासु च । दुर्वाससं वासयेत् को ब्राह्मणं सत्कृतं गृहे ॥ १६ ॥ वे ब्राह्मण देवता जिस समय यहाँ पधारे थे, उस समय धर्मशालाओंमें और चौराहोंपर यह गाथा गाते फिरते थे कि 'कौन मुझ दुर्वासा ब्राह्मणको अपने घरमें सत्कारपूर्वक ठहरायेगा ॥ १६ ॥ रोषणः सर्वभूतानां सूक्ष्मेऽप्यपकृते कृते । परिभाषां च मे श्रुत्वा को नु दद्यात् प्रतिश्रयम् ॥ १७ ॥ यो मां कश्चिद् वासयीत न स मां कोपयेदिति । 'यदि मेरा थोड़ा-सा भी अपराध बन जाय तो मैं समस्त प्राणियोंपर अत्यन्त कुपित हो उठता हूँ। मेरे इस भाषणको सुनकर कौन मेरे लिये ठहरनेका स्थान देगा? जो कोई मुझे अपने घरमें ठहराये, वह मुझे क्रोध न दिलाये। इस बातके लिये उसे सतत सावधान रहना होगा' ॥ १७ ½ ॥ यस्मान्नाद्रियते कश्चित् ततोऽहं समवासयम् ॥ १८ ॥ स सम्भुङ्क्ते सहस्राणां बहूनामन्नमेकदा । एकदा सोऽल्पकं भुङ्क्ते न चैवैति पुनर्गृहम् ॥ १९ ॥ बेटा! जब कोई भी उनका आदर न कर सका तब मैंने उन्हें अपने घरमें ठहराया। वे कभी तो एक ही समय इतना अन्न भोजन कर लेते थे, जितनेसे कई हजार मनुष्य तृप्त हो सकते थे और कभी बहुत थोड़ा अन्न खाते तथा घरसे निकल जाते थे। उस दिन फिर घरको नहीं लौटते थे ॥ १८-१९ ॥ अकस्माच्च प्रहसति तथाकस्मात् प्ररोदिति । न चास्य वयसा तुल्यः पृथिव्यामभवत् तदा ॥ २० ॥ वे अकस्मात् जोर-जोरसे हँसने लगते और अचानक फूट-फूटकर रो पड़ते थे। उस समय इस पृथ्वीपर उनका समवयस्क कोई नहीं था ॥ २० ॥ अथ स्वावसथं गत्वा स शय्यास्तरणानि च । कन्याश्चालंकृता दग्ध्वा ततो व्यपगतः पुनः ॥ २१ ॥