महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1519, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारत! वह बाण सूर्यके समान कान्तिमान् और प्रलयाग्निके समान तेजस्वी था। उसके द्वारा रुद्रदेवने उन तीनों पुरोंसहित वहाँके समस्त असुरोंको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ३१ ॥
तं चैवाङ्कगतं दृष्ट्वा बालं पञ्चशिखं पुनः । उमा जिज्ञासमाना वै कोऽयमित्यब्रवीत् तदा ॥ ३२ ॥ फिर वे पाँच शिखावाले बालकके रूपमें प्रकट हुए और उमादेवी उन्हें अंकमें लेकर देवताओंसे पूछने लगीं—‘पहचानो, ये कौन हैं?’ ॥ ३२ ॥
असूयतश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः । स वज्रं स्तम्भयामास तं बाहुं परिघोपमम् ॥ ३३ ॥ उस समय इन्द्रको बड़ी ईर्ष्या हुई। वे वज्रसे उस बालकपर प्रहार करना ही चाहते थे कि उसने परिघके समान मोटी उनकी उस बाँहको वज्रसहित स्तम्भित कर दिया ॥ ३३ ॥
न सम्बुबुधिरे चैव देवास्तं भुवनेश्वरम् । सप्रजापतयः सर्वे तस्मिन् मुमुहुरीश्वरे ॥ ३४ ॥ समस्त देवता और प्रजापति उन भुवनेश्वर महादेवजीको न पहचान सके। सबको उन ईश्वरके विषयमें मोह छा गया ॥ ३४ ॥
ततो ध्यात्वा च भगवान् ब्रह्मा तममितौजसम् । अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तमुमापतिम् ॥ ३५ ॥ तब भगवान् ब्रह्माने ध्यान करके उन अमित-तेजस्वी उमापतिको पहचान लिया और ‘ये ही सबसे श्रेष्ठ देवता हैं’ ऐसा जानकर उन्होंने उनकी वन्दना की ॥ ३५ ॥
ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुराः । बभूव स तदा बाहुर्बलहन्तुर्यथा पुरा ॥ ३६ ॥ तत्पश्चात् उन देवताओंने उमादेवी और भगवान् रुद्रको प्रसन्न किया। तब इन्द्रकी वह बाँह पूर्ववत् हो गयी ॥ ३६ ॥
स चापि ब्राह्मणो भूत्वा दुर्वासा नाम वीर्यवान् । द्वारवत्यां मम गृहे चिरं कालमुपावसत् ॥ ३७ ॥ वे ही पराक्रमी महादेव दुर्वासा नामक ब्राह्मण बनकर द्वारकापुरीमें मेरे घरके भीतर दीर्घकालतक टिके रहे ॥ ३७ ॥
विप्रकारान् प्रयुङ्क्ते स्म सुबहून् मम वेश्मनि । तानुदारतया चाहं चक्षमे चातिदुःसहान् ॥ ३८ ॥ उन्होंने मेरे महलमें मेरे विरुद्ध बहुत-से अपराध किये। वे सभी अत्यन्त दुःसह थे तो भी मैंने उदारतापूर्वक क्षमा किया ॥ ३८ ॥
स वै रुद्रः स च शिवः सोऽग्निः सर्वः स सर्वजित् । स चैवेन्द्रश्च वायुश्च सोऽश्विनौ स च विद्युतः ॥ ३९ ॥