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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1520, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1520

वे ही रुद्र हैं, वे ही शिव हैं, वे ही अग्नि हैं, वे ही सर्वस्वरूप और सर्वविजयी हैं। वे ही इन्द्र और वायु हैं, वे ही अश्विनीकुमार और विद्युत् हैं ॥ ३९ ॥

स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः। स कालः सोऽन्तको मृत्युः स यमो रात्र्यहानि च ॥ ४० ॥

वे ही चन्द्रमा, वे ही ईशान, वे ही सूर्य, वे ही वरुण, वे ही काल, वे ही अन्तक, वे ही मृत्यु, वे ही यम तथा वे ही रात और दिन हैं ॥ ४० ॥

मासार्धमासा ऋतवः संध्ये संवत्सरश्च सः। स धाता स विधाता च विश्वकर्मा स सर्ववित् ॥ ४१ ॥

मास, पक्ष, ऋतु, संध्या और संवत्सर भी वे ही हैं। वे ही धाता, विधाता, विश्वकर्मा और सर्वज्ञ हैं ॥ ४१ ॥

नक्षत्राणि गृहाश्चैव दिशोऽथ प्रदिशस्तथा। विश्वमूर्तिरमेयात्मा भगवान् परमद्युतिः ॥ ४२ ॥

नक्षत्र, गृह, दिशा, विदिशा भी वे ही हैं। वे ही विश्वरूप, अप्रमेयात्मा, षड्विध ऐश्वर्यसे युक्त एवं परम तेजस्वी हैं ॥ ४२ ॥

एकधा च द्विधा चैव बहुधा च स एव हि। शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा ॥ ४३ ॥

उनके एक, दो, अनेक, सौ, हजार और लाखों रूप हैं ॥ ४३ ॥

ईदृशः स महादेवो भूयश्च भगवानतः। न हि शक्या गुणा वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥ ४४ ॥

भगवान् महादेव ऐसे प्रभावशाली हैं, बल्कि इससे भी बढ़कर हैं। सैकड़ों वर्षोंमें भी उनके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ईश्वरप्रशंसा नाम षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ईश्वरकी प्रशंसा नामक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६० ॥


महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 1520, कुल 2566 में से · BharatKosha