महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1641, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमंगलयुक्त थे। धर्ममें सत्यकी प्रधानता थी और सत्य उत्तम विषयोंसे युक्त होता था ॥ धर्मासनस्थः सद्भिः स स्त्रीबालातुरवृद्धकान् ॥ वर्णाश्रमान् पूर्वकृतान् सकलान् रक्षणोद्यतः । धर्मके आसनपर बैठे हुए युधिष्ठिर सत्पुरुषों, स्त्रियों, बालकों, रोगियों, बड़े-बूढ़ों तथा पूर्वनिर्मित सम्पूर्ण वर्णाश्रम-धर्मोंकी रक्षाके लिये सदा उद्यत रहते थे ॥ अवृत्तिवृत्तिदानाद्यैर्यज्ञार्थैर्दीपितैरपि । आमुष्मिकं भयं नास्ति ऐहिकं कृतमेव तु । स्वर्गलोकोपमो लोकस्तदा तस्मिन् प्रशासति ॥ बभूव सुखमेकाग्रं तद्विशिष्टतरं परम् ॥ वे जीविकाहीन मनुष्योंको जीविका प्रदान करते, यज्ञके लिये धन दिलाते तथा अन्यान्य उपायोंद्वारा प्रजाकी रक्षा करते थे। अतः इहलोकका सारा सुख तो सबको प्राप्त ही था, परलोकका भी भय नहीं रह गया था। उनके शासनकालमें सारा जगत् स्वर्गलोकके समान सुखद हो गया था। यहाँका एकाग्र सुख स्वर्गसे भी विशिष्ट एवं उत्तम था ॥ नार्यः पतिव्रताः सर्वा रूपवत्यः स्वलंकृताः । यथोक्तवृत्ताः स्वगुणैर्बभूवुः प्रीतिहेतवः ॥ उनके राज्यकी सारी स्त्रियाँ पतिव्रता, रूपवती, आभूषणोंसे विभूषित और शास्त्रोक्त सदाचारसे सम्पन्न होती थीं। वे अपने उत्तम गुणोंद्वारा पतिकी प्रसन्नताको बढ़ानेमें कारण होती थीं ॥ पुमांसः पुण्यशीलाढ्याः स्वं स्वं धर्ममनुव्रताः । सुखिनः सूक्ष्ममप्येनो न कुर्वन्ति कदाचन ॥ पुरुष पुण्यशील, अपने-अपने धर्ममें अनुरक्त और सुखी थे। वे कभी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पाप भी नहीं करते थे ॥ सर्वे नराश्च नार्यश्च सततं प्रियवादिनः । अजिह्यमनसः शुक्लाः बभूवुः श्रमवर्जिताः ॥ सभी स्त्री-पुरुष सदा प्रिय वचन बोलते थे, मनमें कुटिलता नहीं आने देते थे, शुद्ध रहते थे और कभी थकावटका अनुभव नहीं करते थे ॥ भूषिताः कुण्डलैर्हारैः कटकैः कटिसूत्रकैः । सुवाससः सुगन्धाढ्याः प्रायशः पृथिवीतले ॥ उन दिनों प्रायः भूतलके सभी मनुष्य कुण्डल, हार, कड़े और करधनीसे विभूषित थे। सुन्दर वस्त्र और सुन्दर गन्धसे सुशोभित होते थे ॥ सर्वे ब्रह्मविदो विप्राः सर्वत्र परिनिष्ठिताः । वलीपलितहीनास्तु सुखिनो दीर्घजीविनः ॥