महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1642, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसभी ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता और समस्त शास्त्रोंमें परिनिष्ठित थे। उनके शरीरमें झुर्रियाँ नहीं पड़ती थीं, उनके बाल सफेद नहीं होते थे और वे सुखी तथा दीर्घजीवी होते थे।।
इच्छा न जायतेऽन्यत्र वर्णेषु च न संकरः।
मनुष्याणां महाराज मर्यादासु व्यवस्थितः॥
महाराज! मनुष्योंकी इच्छा परायी स्त्रियोंके लिये नहीं होती थी, वर्णोंमें कभी संकरता नहीं आती थी और सब लोग मर्यादामें स्थित रहते थे।।
तस्मिञ्छासति राजेन्द्र मृगव्यालसरीसृपाः।
अन्योन्यमपि चान्येषु न बाधन्ते कदाचन॥
राजेन्द्र युधिष्ठिरके शासनकालमें हिंसक पशु, सर्प और बिच्छू आदि न तो आपसमें और न दूसरोंको ही कभी बाधा पहुँचाते थे।।
गावः सुक्षीरभूयिष्ठाः सुवालधिमुखोदराः।
अपीडिताः कर्षकाद्यैर्हृतव्याधितवत्सकाः॥
गौएँ बहुत दूध देती थीं, उनके मुख, पूँछ और उदर सुन्दर होते थे। किसान आदि उन्हें पीड़ा नहीं देते थे और उनके बछड़े भी नीरोग होते थे।।
अवन्ध्यकाला मनुजाः पुरुषार्थेषु च क्रमात्।
विषयेष्वनिषिद्धेषु वेदशास्त्रेषु चोद्यताः॥
उस समयके सभी मनुष्य अपने समयको व्यर्थ नहीं जाने देते थे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन पुरुषार्थोंमें क्रमशः प्रवृत्त होते थे। शास्त्रमें जिनका निषेध नहीं किया गया है, उन्हीं विषयोंका सेवन करते और वेदशास्त्रोंके स्वाध्यायके लिये सदा उद्यत रहते थे।।
सुवृत्ता वृषभाः पुष्टाः सुस्वभावाः सुखोदयाः।
अतीव मधुरः शब्दः स्पर्शश्चातिसुखं रसम्।
रूपं दृष्टिक्षमं रम्यं मनोज्ञं गन्धवद् बभौ॥
उस समयके बैल अच्छी चाल-ढालवाले, हृष्ट-पुष्ट, अच्छे स्वभाववाले और सुखकी प्राप्ति करानेवाले होते थे। उन दिनों शब्द और स्पर्श नामक विषय अत्यन्त मधुर होते थे। रस बहुत ही सुखद जान पड़ता था, रूप दर्शनीय एवं रमणीय प्रतीत होता था और गन्ध नामक विषय भी मनोरम जान पड़ता था।।
धर्मार्थकामसंयुक्तं मोक्षाभ्युदयसाधनम्।
प्रह्लादजननं पुण्यं सम्बभूवाथ मानसम्॥
सबका मन धर्म, अर्थ और काममें संलग्न, मोक्ष और अभ्युदयके साधनमें तत्पर, आनन्दजनक और पवित्र होता था।।
स्थावरा बहुपुष्पाढ्याः फलच्छायावहास्तथा।
सुस्पर्शा विषहीनाश्च सुपत्रत्वक्प्ररोहिणः॥