भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1690, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1690

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द्वाविंशोऽध्यायः

मन-बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन-इन्द्रिय-संवादका वर्णन

ब्राह्मण उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
सुभगे सप्तहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणने कहा— सुभगे! इसी विषयमें इस पुरातन इतिहासका भी उदाहरण दिया जाता है। सात होताओंके यज्ञका जैसा विधान है, उसे सुनो ॥ १ ॥

घ्राणश्चक्षुश्च जिह्वा च त्वक् श्रोत्रं चैव पञ्चमम् ।
मनो बुद्धिश्च सप्तैते होतारः पृथगाश्रिताः ॥ २ ॥
सूक्ष्मेऽवकाशे तिष्ठन्तो न पश्यन्तीतरेतरम् ।
एतान् वै सप्तहोतॄंस्त्वं स्वभावाद् विद्धि शोभने ॥ ३ ॥
नासिका, नेत्र, जिह्वा, त्वचा और पाँचवाँ कान, मन और बुद्धि—ये सात होता अलग-अलग रहते हैं। यद्यपि ये सभी सूक्ष्म शरीरमें ही निवास करते हैं तो भी एक-दूसरेको नहीं देखते हैं। शोभने! इन सात होताओंको तुम स्वभावसे ही पहचानो ॥ २-३ ॥

ब्राह्मण्युवाच

सूक्ष्मेऽवकाशे सन्तस्ते कथं नान्योन्यदर्शिनः ।
कथंस्वभावा भगवंन्नेतदाचक्ष्व मे प्रभो ॥ ४ ॥
ब्राह्मणीने पूछा— भगवन्! जब सभी सूक्ष्म शरीरमें ही रहते हैं, तब एक-दूसरेको देख क्यों नहीं पाते? प्रभो! उनके स्वभाव कैसे हैं? यह बतानेकी कृपा करें ॥ ४ ॥

ब्राह्मण उवाच

गुणाज्ञानमविज्ञानं गुणज्ञानमभिज्ञता ।
परस्परं गुणानेते नाभिजानन्ति कर्हिचित् ॥ ५ ॥
ब्राह्मणने कहा— प्रिये! (यहाँ देखनेका अर्थ है, जानना) गुणोंको न जानना ही गुणवान्‌को न जानना कहलाता है और गुणोंको जानना ही गुणवान्‌को जानना है। ये नासिका आदि सात होता एक-दूसरेके गुणोंको कभी नहीं जान पाते हैं (इसीलिये कहा गया है कि ये एक-दूसरेको नहीं देखते हैं) ॥ ५ ॥

जिह्वा चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न गन्धानधिगच्छन्ति घ्राणस्तानधिगच्छति ॥ ६ ॥