भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1691, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1691

जीभ, आँख, कान, त्वचा, मन और बुद्धि—ये गन्धोंको नहीं समझ पाते, किंतु नासिका उसका अनुभव करती है ।। ६ ।।

घ्राणं चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च । न रसानधिगच्छन्ति जिह्वा तानधिगच्छति ।। ७ ।।

नासिका, कान, नेत्र, त्वचा, मन और बुद्धि—ये रसोंका आस्वादन नहीं कर सकते। केवल जिह्वा उसका स्वाद ले सकती है ।। ७ ।।

घ्राणं जिह्वा तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च । न रूपाण्यधिगच्छन्ति चक्षुस्तान्यधिगच्छति ।। ८ ।।

नासिका, जीभ, कान, त्वचा, मन और बुद्धि—ये रूपका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते; किंतु नेत्र इनका अनुभव करते हैं ।। ८ ।।

घ्राणं जिह्वा ततश्चक्षुः श्रोत्रं बुद्धिर्मनस्तथा । न स्पर्शानधिगच्छन्ति त्वक् च तानधिगच्छति ।। ९ ।।

नासिका, जीभ, आँख, कान, बुद्धि और मन—ये स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकते; किंतु त्वचाको उसका ज्ञान होता है ।। ९ ।।

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च वाङ्मनो बुद्धिरेव च । न शब्दानधिगच्छन्ति श्रोत्रं तानधिगच्छति ।। १० ।।

नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, मन और बुद्धि—इन्हें शब्दका ज्ञान नहीं होता; किंतु कानको होता है ।। १० ।।

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं बुद्धिरेव च । संशयं नाधिगच्छन्ति मनस्तमधिगच्छति ।। ११ ।।

नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान और बुद्धि—ये संशय (संकल्प-विकल्प) नहीं कर सकते। यह काम मनका है ।। ११ ।।

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं मन एव च । न निष्ठामधिगच्छन्ति बुद्धिस्तामधिगच्छति ।। १२ ।।

इसी प्रकार नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान, और मन—वे किसी बातका निश्चय नहीं कर सकते। निश्चयात्मक ज्ञान तो केवल बुद्धिको होता है ।। १२ ।।

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । इन्द्रियाणां च संवादं मनसश्चैव भामिनि ।। १३ ।।

भामिनि! इस विषयमें इन्द्रियों और मनके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।। १३ ।।

मन उवाच

नाघ्राति मामृते घ्राणं रसं जिह्वा न वेत्ति च ।