भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1826, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1826

जो अहंता-ममतासे रहित हैं, वे महात्मा विशुद्ध ध्यानयोगके द्वारा महान् उत्तम लोकको प्राप्त करते हैं ॥ २२ ॥
ध्यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतयः सदा ।
सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमाः ॥ २३ ॥
जो ध्यानयोगका आश्रय लेकर सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं, वे आत्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुष सुखकी राशिभूत अव्यक्त परमात्मामें प्रवेश करते हैं ॥ २३ ॥
ध्यानयोगमादुपागम्य निर्ममा निरहंकृताः ।
अव्यक्तं प्रविशन्तीह महतां लोकमुत्तमम् ॥ २४ ॥
किंतु जो ध्यानयोगसे पीछे लौटकर अर्थात् ध्यानमें असफल होकर ममता और अहंकारसे रहित जीवन व्यतीत करता है, वह निष्काम पुरुष भी महापुरुषोंके उत्तम अव्यक्त लोकमें लीन होता है ॥ २४ ॥
अव्यक्तादेव सम्भूतः समसंज्ञां गतः पुनः ।
तमोरजोभ्यां निर्मुक्तः सत्त्वमास्थाय केवलम् ॥ २५ ॥
फिर स्वयं भी उसकी समताको प्राप्त होकर अव्यक्तसे ही प्रकट होता है और केवल सत्त्वका आश्रय लेकर तमोगुण एवं रजोगुणके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ॥ २५ ॥
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वं सृजति निष्कलम् ।
क्षेत्रज्ञ इति तं विद्याद् यस्तं वेद स वेदवित् ॥ २६ ॥
जो सब पापोंसे मुक्त रहकर सबकी सृष्टि करता है, उस अखण्ड आत्माको क्षेत्रज्ञ समझना चाहिये। जो मनुष्य उसका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वही वेदवेत्ता है ॥
चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संयतः ।
यच्चित्तं तन्मयो वश्यं गुह्यमेतत् सनातनम् ॥ २७ ॥
मुनिको उचित है कि चिन्तनके द्वारा चेतना (सम्यग्ज्ञान) पाकर मन और इन्द्रियोंको एकाग्र करके परमात्माके ध्यानमें स्थित हो जाय; क्योंकि जिसका चित्त जिसमें लगा होता है, वह निश्चय ही उसका स्वरूप हो जाता है—यह सनातन गोपनीय रहस्य है ॥ २७ ॥
अव्यक्तादिविशेषान्तमविद्यालक्षणं स्मृतम् ।
निबोधत तथा हीदं गुणैर्लक्षणमित्युत ॥ २८ ॥
अव्यक्तसे लेकर सोलह विशेषोंतक सभी अविद्याके लक्षण बताये गये हैं। ऐसा समझना चाहिये कि यह गुणोंका ही विस्तार है ॥ २८ ॥
द्वयक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् ।
ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ॥ २९ ॥
दो अक्षरका पद ‘मम’ (यह मेरा है—ऐसा भाव) मृत्युरूप है और तीन अक्षरका पद ‘न मम’ (यह मेरा नहीं है—ऐसा भाव) सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ २९ ॥
कर्म केचित् प्रशंसन्ति मन्दबुद्धिरता नराः ।