भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1827, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1827

ये तु वृद्धा महात्मानो न प्रशंसन्ति कर्म ते ॥ ३० ॥ कुछ मन्द-बुद्धियुक्त पुरुष (स्वर्गादि फल प्रदान करनेवाले) काम्य-कर्मोंकी प्रशंसा करते हैं, किंतु वृद्ध महात्माजन उन कर्मोंको उत्तम नहीं बतलाते ॥ ३० ॥

कर्मणा जायते जन्तुर्मूर्तिमान् षोडशात्मकः । पुरुषं ग्रसतेऽविद्या तद् ग्राह्यममृताशिनाम् ॥ ३१ ॥ क्योंकि सकाम कर्मके अनुष्ठानसे जीवको सोलह विकारोंसे निर्मित स्थूल शरीर धारण करके जन्म लेना पड़ता है और वह सदा अविद्याका ग्रास बना रहता है। इतना ही नहीं, कर्मठ पुरुष देवताओंके भी उपभोगका विषय होता है ॥ ३१ ॥

तस्मात् कर्मसु निःस्नेहा ये केचित् पारदर्शिनः । विद्यामयोऽयं पुरुषो न तु कर्ममयः स्मृतः ॥ ३२ ॥ इसलिये जो कोई पारदर्शी विद्वान् होते हैं, वे कर्मोंमें आसक्त नहीं होते; क्योंकि यह पुरुष (आत्मा) ज्ञानमय है, कर्ममय नहीं ॥ ३२ ॥

य एवममृतं नित्यमग्राह्यं शश्वदक्षरम् । वश्यात्मानमसंस्लिष्टं यो वेद न मृतो भवेत् ॥ ३३ ॥ जो इस प्रकार चेतन आत्माको अमृतस्वरूप, नित्य, इन्द्रियातीत, सनातन, अक्षर, जितात्मा एवं असंग समझता है, वह कभी मृत्युके बन्धनमें नहीं पड़ता ॥ ३३ ॥

अपूर्वमकृतं नित्यं य एनमविचारिणम् । य एवं विन्देदात्मानमग्राह्यममृताशनम् । अग्राह्योऽमृतो भवति स एभिः कारणैर्ध्रुवः ॥ ३४ ॥ जिसकी दृष्टिमें आत्मा अपूर्व (अनादि), अकृत (अजन्मा), नित्य, अचल, अग्राह्य और अमृताशी है, वह इन गुणोंका चिन्तन करनेसे स्वयं भी अग्राह्य (इन्द्रियातीत), निश्चल एवं अमृतस्वरूप हो जाता है ॥ ३४ ॥

आयोज्य सर्वसंस्कारान् संयम्यात्मानमात्मनि । स तद् ब्रह्म शुभं वेत्ति यस्माद् भूयो न विद्यते ॥ ३५ ॥ जो चित्तको शुद्ध करनेवाले सम्पूर्ण संस्कारोंका सम्पादन करके मनको आत्माके ध्यानमें लगा देता है, वही उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त करता है, जिससे बड़ा कोई नहीं है ॥ ३५ ॥

प्रसादे चैव सत्त्वस्य प्रसादं समवाप्नुयात् । लक्षणं हि प्रसादस्य यथा स्यात् स्वप्नदर्शनम् ॥ ३६ ॥ सम्पूर्ण अन्तःकरणके स्वच्छ हो जानेपर साधकको शुद्ध प्रसन्नता प्राप्त होती है। जैसे स्वप्नसे जगे हुए मनुष्यके लिये स्वप्न शान्त हो जाता है, उसी प्रकार चित्तशुद्धिका लक्षण है ॥ ३६ ॥

गतिरेषा तु मुक्तानां ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः ।