भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1828, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1828

प्रवृत्तयश्च याः सर्वाः पश्यन्ति परिणामजाः ॥ ३७ ॥
ज्ञाननिष्ठ जीवन्मुक्त महात्माओंकी यही परम गति है; क्योंकि वे उन समस्त प्रवृत्तियोंको शुभाशुभ फल देनेवाली समझते हैं ॥ ३७ ॥
एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्मः सनातनः ।
एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद् वृत्तमनिन्दितम् ॥ ३८ ॥
यही विरक्त पुरुषोंकी गति है, यही सनातन धर्म है, यही ज्ञानियोंका प्राप्तव्य स्थान है और यही अनिन्दित सदाचार है ॥ ३८ ॥
समेन सर्वभूतेषु निःस्पृहेण निराशिषा ।
शक्या गतिरियं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना ॥ ३९ ॥
जो सम्पूर्ण भूतोंमें समानभाव रखता है, लोभ और कामनासे रहित है तथा जिसकी सर्वत्र समान दृष्टि रहती है, वह ज्ञानी पुरुष ही इस परम गतिको प्राप्त कर सकता है ॥ ३९ ॥
एतद् वः सर्वमाख्यातं मया विप्रर्षिसत्तमाः ।
एवमाचरत क्षिप्रं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ ॥ ४० ॥
ब्रह्मर्षियो! यह सब विषय मैंने विस्तारके साथ तुम लोगोंको बता दिया। इसीके अनुसार आचरण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही परम सिद्धि प्राप्त होगी ॥ ४० ॥

गुरुरुवाच

इत्युक्तास्ते तु मुनयो गुरुणा ब्रह्मणा तथा ।
कृतवन्तो महात्मानस्ततो लोकमवाप्नुवन् ॥ ४१ ॥
**गुरुने कहा—**बेटा! ब्रह्माजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर उन महात्मा मुनियोंने इसीके अनुसार आचरण किया। इससे उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति हुई ॥ ४१ ॥
त्वमप्येतन्महाभाग मयोक्तं ब्रह्मणो वचः ।
सम्यगाचर शुद्धात्मंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ ४२ ॥
महाभाग! तुम्हारा चित्त शुद्ध है, इसलिये तुम भी मेरे बताये हुए ब्रह्माजीके उत्तम उपदेशका भलीभाँति पालन करो। इससे तुम्हें भी सिद्धि प्राप्त होगी ॥ ४२ ॥

वासुदेव उवाच

इत्युक्तः स तदा शिष्यो गुरुणा धर्ममुत्तमम् ।
चकार सर्वं कौन्तेय ततो मोक्षमवाप्तवान् ॥ ४३ ॥
**श्रीकृष्णने कहा—**अर्जुन! गुरुदेवके ऐसा कहनेपर उस शिष्यने समस्त उत्तम धर्मोंका पालन किया। इससे वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो गया ॥ ४३ ॥
कृतकृत्यश्च स तदा शिष्यः कुरुकुलोद्वह ।
तत् पदं समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति ॥ ४४ ॥

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