महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1829, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुरुकुलनन्दन! उस समय कृतार्थ होकर उस शिष्यने वह ब्रह्मपद प्राप्त किया, जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता ॥ ४४ ॥
अर्जुन उवाच
को न्वसौ ब्राह्मणः कृष्ण कश्च शिष्यो जनार्दन ।
श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तत्त्वमाचक्ष्व मे विभो ॥ ४५ ॥
अर्जुनने पूछा— जनार्दन श्रीकृष्ण! वे ब्रह्मनिष्ठ गुरु कौन थे और शिष्य कौन थे? प्रभो! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो ठीक-ठीक बतानेकी कृपा कीजिये ॥ ४५ ॥
वासुदेव उवाच
अहं गुरुर्महाबाहो मनः शिष्यं च विद्धि मे ।
त्वत्प्रीतया गुह्यमेतच्च कथितं ते धनंजय ॥ ४६ ॥
श्रीकृष्णने कहा— महाबाहो! मैं ही गुरु हूँ और मेरे मनको ही शिष्य समझो। धनंजय! तुम्हारे स्नेहवश मैंने इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है ॥ ४६ ॥
मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्नित्यं कुरुकुलोद्वह ।
अध्यात्ममेतच्छ्रुत्वा त्वं सम्यगाचर सुव्रत ॥ ४७ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुकुलनन्दन! यदि मुझपर तुम्हारा प्रेम हो तो इस अध्यात्मज्ञानको सुनकर तुम नित्य इसका यथावत् पालन करो ॥ ४७ ॥
ततस्त्वं सम्यगाचीर्णे धर्मेऽस्मिन्नरिकर्षण ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो मोक्षं प्राप्स्यसि केवलम् ॥ ४८ ॥
शत्रुदमन! इस धर्मका पूर्णतया आचरण करनेपर तुम समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध मोक्षको प्राप्त कर लोगे ॥ ४८ ॥
पूर्वमप्येतदेवोक्तं युद्धकाल उपस्थिते ।
मया तव महाबाहो तस्मादत्र मनः कुरु ॥ ४९ ॥
महाबाहो! पहले भी मैंने युद्धकाल उपस्थित होनेपर यही उपदेश तुमको सुनाया था। इसलिये तुम इसमें मन लगाओ ॥ ४९ ॥
मया तु भरतश्रेष्ठ चिरदृष्टः पिता प्रभुः ।
तमहं द्रष्टुमिच्छामि सम्मते तव फाल्गुन ॥ ५० ॥
भरतश्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं पिताजीका दर्शन करना चाहता हूँ। उन्हें देखे बहुत दिन हो गये। यदि तुम्हारी राय हो तो मैं उनके दर्शनके लिये द्वारका जाऊँ ॥ ५० ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवचनं कृष्णं प्रत्युवाच धनंजयः ।
गच्छावो नगरं कृष्ण गजसाह्वयमद्य वै ॥ ५१ ॥