महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1834, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंबलदेवं च दुर्धर्षं तथान्यान् वृष्णिपुङ्गवान् । 'धर्मज्ञ एवं निष्पाप भगवान् जनार्दन! मैं धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरके पास चलकर उनसे आपके जानेके लिये आज्ञा प्रदान करनेका अनुरोध करूँगा। इस समय आपका द्वारका जाना आवश्यक है, इसमें मेरी भी सम्मति है। अब आप शीघ्र ही मामाजीका दर्शन करेंगे और दुर्जय वीर बलदेवजी तथा अन्यान्य वृष्णिवंशी वीरोंसे मिल सकेंगे' ।। २२-२३ १/२ ।। एवं सम्भाषमाणौ तौ प्राप्तौ वारणसाह्वयम् ।। २४ ।। तथा विविशतुश्चोभौ सम्प्रहृष्टनराकुलम् । इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों मित्र हस्तिनापुरमें जा पहुँचे। उन दोनोंने हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए नगरमें प्रवेश किया ।। २४ १/२ ।। तौ गत्वा धृतराष्ट्रस्य गृहं शक्रगृहोपमम् ।। २५ ।। ददृशाते महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् । विदुरं च महाबुद्धिं राजानं च युधिष्ठिरम् ।। २६ ।। महाराज! इन्द्रभवनके समान शोभा पानेवाले धृतराष्ट्रके महलमें उन दोनोंने राजा धृतराष्ट्र, महाबुद्धिमान् विदुर और राजा युधिष्ठिरका दर्शन किया ।। २५-२६ ।। भीमसेनं च दुर्धर्षं माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । धृतराष्ट्रमुपासीनं युयुत्सुं चापराजितम् ।। २७ ।। गान्धारीं च महाप्रज्ञां पृथां कृष्णां च भामिनीम् । सुभद्राद्याश्च ताः सर्वा भरतानां स्त्रियस्तथा ।। २८ ।। ददृशाते स्त्रियः सर्वा गान्धारीपरिचारिकाः । फिर क्रमशः दुर्जय वीर भीमसेन, माद्रीनन्दन पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव, धृतराष्ट्रकी सेवामें लगे रहनेवाले अपराजित वीर युयुत्सु, परम बुद्धिमती गान्धारी, कुन्ती, भार्या द्रौपदी तथा सुभद्रा आदि भरतवंशकी सभी स्त्रियोंसे मिले। गान्धारीकी सेवामें रहनेवाली उन सभी स्त्रियोंका उन दोनोंने दर्शन किया ।। २७-२८ १/२ ।। ततः समेत्य राजानं धृतराष्ट्रमरिंदमौ ।। २९ ।। निवेद्य नामधेये स्वे तस्य पादावगृह्णताम् । गान्धार्याश्च पृथायाश्च धर्मराजस्य चैव हि ।। ३० ।। भीमस्य च महात्मानौ तथा पादावगृह्णताम् । सबसे पहले उन शत्रुदमन वीरोंने राजा धृतराष्ट्रके पास जाकर अपने नाम बताते हुए उनके दोनों चरणोंका स्पर्श किया। उसके बाद उन महात्माओंने गान्धारी, कुन्ती, धर्मराज युधिष्ठिर और भीमसेनके पैर छूये ।। २९-३० १/२ ।। क्षत्तारं चापि संगृह्य पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् ।। ३१ ।। (परिष्वज्य महात्मानं वैश्यापुत्रं महारथम् ।) तैः सार्धं नृपतिं वृद्धं ततस्तौ पर्युपासताम् ।