भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1835, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1835

फिर विदुरजीसे मिलकर उनका कुशल-मंगल पूछा। इसके बाद वैश्यापुत्र महारथी महामना युयुत्सुको भी हृदयसे लगाया। तत्पश्चात् उन सबके साथ वे दोनों बूढ़े राजा धृतराष्ट्रके पास जा बैठे ॥ ३१ ½ ॥

ततो निशि महाराजो धृतराष्ट्रः कुरूद्वहान् ॥ ३२ ॥
जनार्दनं च मेधावी व्यसर्जयत वै गृहान् ।
तेऽनुज्ञाता नृपतिना ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥ ३३ ॥
रात हो जानेपर मेधावी महाराज धृतराष्ट्रने उन कुरुश्रेष्ठ वीरों तथा भगवान् श्रीकृष्णको अपने-अपने घरमें जानेके लिये विदा किया। राजाकी आज्ञा पाकर वे सब लोग अपने-अपने घरको गये ॥ ३२-३३ ॥

धनंजयगृहानेव ययौ कृष्णस्तु वीर्यवान् ।
तत्रार्चितो यथान्यायं सर्वकामैरुपस्थितः ॥ ३४ ॥
पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनके ही घरमें गये। वहाँ उनकी यथोचित पूजा हुई और सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थ उनकी सेवामें उपस्थित किये गये ॥ ३४ ॥

कृष्णः सुष्वाप मेधावी धनंजयसहायवान् ।
प्रभातायां तु शर्वर्यां कृत्वा पौर्वाह्निकीं क्रियाम् ॥ ३५ ॥
धर्मराजस्य भवनं जग्मतुः परमार्चितौ ।
यत्रास्ते स सहामात्यो धर्मराजो महाबलः ॥ ३६ ॥
भोजनके पश्चात् मेधावी श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ सोये। जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब पूर्वाह्नकालकी क्रिया—संध्या-वन्दन आदि करके वे दोनों परम पूजित मित्र धर्मराज युधिष्ठिरके महलमें गये। जहाँ महाबली धर्मराज अपने मन्त्रियोंके साथ रहते थे ॥ ३५-३६ ॥

तौ प्रविश्य महात्मानौ तद् गृहं परमार्चितम् ।
धर्मराजं ददृशतुर्देवराजमिवाश्विनौ ॥ ३७ ॥
उस परम सुन्दर एवं सुसज्जित भवनमें प्रवेश करके उन महात्माओंने धर्मराज युधिष्ठिरका दर्शन किया। मानो दोनों अश्विनीकुमार देवराज इन्द्रसे आकर मिले हों ॥ ३७ ॥

समासाद्य तु राजानं वार्ष्णेयकुरुपुङ्गवौ ।
निषीदतुरुनुज्ञातौ प्रीयमाणेन तेन तौ ॥ ३८ ॥
श्रीकृष्ण और अर्जुन जब राजाके पास पहुँचे, तब उन्हें देख उनको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर उनके आज्ञा देनेपर वे दोनों मित्र आसनपर विराजमान हुए ॥ ३८ ॥

ततः स राजा मेधावी विवक्षू प्रेक्ष्य तावुभौ ।
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो वचनं राजसत्तमः ॥ ३९ ॥
तत्पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ भूपालशिरोमणि मेधावी युधिष्ठिरने उन्हें कुछ कहनेके लिये इच्छुक देख उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३९ ॥