महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1836, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुधिष्ठिर उवाच
विवक्षू हि युवां मन्ये वीरौ यदुकुरूद्वहौ ।
ब्रूतं कर्तास्मि सर्वं वां नचिरान्मा विचार्यताम् ॥ ४० ॥
**युधिष्ठिर बोले—**यदुकुल और कुरुकुलको अलंकृत करनेवाले वीरो! मालूम होता है, तुमलोग मुझसे कुछ कहना चाहते हो। जो भी कहना हो, कहो; मैं तुम्हारी सारी इच्छाओंको शीघ्र ही पूर्ण करूँगा। तुम मनमें कुछ अन्यथा विचार न करो ॥ ४० ॥
इत्युक्तः फाल्गुनस्तत्र धर्मराजानमब्रवीत् ।
विनीतवदुपागम्य वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ ४१ ॥
उनके इस प्रकार कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल अर्जुनने धर्मराजके पास जाकर बड़े विनीत भावसे कहा— ॥ ४१ ॥
अयं चिरोषितो राजन् वासुदेवः प्रतापवान् ।
भवन्तं समनुज्ञाप्य पितरं द्रष्टुमिच्छति ॥ ४२ ॥
स गच्छेदभ्यनुज्ञातो भवता यदि मन्यसे ।
आनर्तनगरीं वीरस्तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ४३ ॥
‘राजन्! परम प्रतापी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको यहाँ रहते बहुत दिन हो गया। अब ये आपकी आज्ञा लेकर अपने पिताजीका दर्शन करना चाहते हैं। यदि आप स्वीकार करें और हर्षपूर्वक आज्ञा दे दें तभी ये वीरवर श्रीकृष्ण आनर्तनगरी द्वारकाको जायँगे। अतः आप इन्हें जानेकी आज्ञा दे दें' ॥ ४२-४३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
पुण्डरीकाक्ष भद्रं ते गच्छ त्वं मधुसूदन ।
पुरीं द्वारवतीमद्य द्रष्टुं शूरसुतं प्रभो ॥ ४४ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**कमलनयन मधुसूदन! आपका कल्याण हो। प्रभो! आप शूरनन्दन वसुदेवजीका दर्शन करनेके लिये आज ही द्वारकाको प्रस्थान कीजिये ॥ ४४ ॥
रोचते मे महाबाहो गमनं तव केशव ।
मातुलश्चिरदृष्टो मे त्वया देवी च देवकी ॥ ४५ ॥
महाबाहु केशव! मुझे आपका जाना इसलिये ठीक लगता है कि आपने मेरे मामाजी और मामी देवकी देवीको बहुत दिनोंसे नहीं देखा है ॥ ४५ ॥
समेत्य मातुलं गत्वा बलदेवं च मानद ।
पूजयेथा महाप्राज्ञ मद्वाक्येन यथार्हतः ॥ ४६ ॥
मानद! महाप्राज्ञ! आप मामाजी तथा भैया बलदेवजीके पास जाकर उनसे मिलिये और मेरी ओरसे उनका यथायोग्य सत्कार कीजिये ॥ ४६ ॥
स्मरेथाश्चापि मां नित्यं भीमं च बलिनां वरम् ।