महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1845, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुने! चारों आश्रमोंमें जो चार प्रकारके धर्म प्रसिद्ध हैं तथा जो सम्पूर्ण वेदोक्त कर्म हैं, उन सबको मेरा स्वरूप ही समझिये ।। ६ ।।
असच्च सदसच्चैव यद् विश्वं सदसत् परम् ।
मत्तः परतरं नास्ति देवदेवात् सनातनात् ।। ७ ।।
असत्, सदसत् तथा उससे भी परे जो अव्यक्त जगत् है, वह भी मुझ सनातन देवाधिदेवसे पृथक् नहीं है ।। ७ ।।
ओङ्कारप्रमुखान् वेदान् विद्धि मां त्वं भृगूद्वह ।
यूपं सोमं चरुं होमं त्रिदशाप्यायनं मखे ।। ८ ।।
होतारमपि हव्यं च विद्धि मां भृगुनन्दन ।
अध्वर्युं कल्पकञ्चापि हविः परमसंस्कृतम् ।। ९ ।।
भृगुश्रेष्ठ! ॐकारसे आरम्भ होनेवाले चारों वेद मुझे ही समझिये। यज्ञमें यूप, सोम, चरु, देवताओंको तृप्त करनेवाला होम, होता और हवन-सामग्री भी मुझे ही जानिये। भृगुनन्दन! अध्वर्यु, कल्पक और अच्छी प्रकार संस्कार किया हुआ हविष्य—ये सब मेरे ही स्वरूप हैं ।।
उद्गाता चापि मां स्तौति गीताघोषैर्महाध्वरे ।
प्रायश्चित्तेषु मां ब्रह्मन् शान्तिमङ्गलवाचकाः ।। १० ।।
स्तुवन्ति विश्वकर्माणं सततं द्विजसत्तम ।
मम विद्धि सुतं धर्ममग्रजं द्विजसत्तम ।। ११ ।।
मानसं दयितं विप्र सर्वभूतदयात्मकम् ।
बड़े-बड़े यज्ञोंमें उद्गाता उच्च स्वरसे सामगान करके मेरी ही स्तुति करते हैं। ब्रह्मन्! प्रायश्चित्त-कर्ममें शान्तिपाठ तथा मंगलपाठ करनेवाले ब्राह्मण सदा मुझ विश्वकर्माका ही स्तवन करते हैं। द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना-रूप जो धर्म है, वह मेरा परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्र है। मेरे मनसे उसका प्रादुर्भाव हुआ है ।। १०-११ १/२ ।।
तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवैः ।। १२ ।।
बह्वीः संसरमाणो वै योनीर्वर्तामि सत्तम ।
धर्मसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।। १३ ।।
तैस्तैर्वेषैश्च रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव ।
भार्गव! उस धर्ममें प्रवृत्त होकर जो पाप-कर्मोंसे निवृत्त हो गये हैं ऐसे मनुष्योंके साथ मैं सदा निवास करता हूँ। साधुशिरोमणे! मैं धर्मकी रक्षा और स्थापनाके लिये तीनों लोकोंमें बहुत-सी योनियोंमें अवतार धारण करके उन-उन रूपों और वेषोंद्वारा तदनुरूप बर्ताव करता हूँ ।। १२-१३ १/२ ।।
अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रोऽथ प्रभवाप्ययः ।। १४ ।।