महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1846, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूतग्रामस्य सर्वस्य स्रष्टा संहार एव च। मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा और मैं ही इन्द्र हूँ। सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कारण भी मैं ही हूँ। समस्त प्राणिसमुदायकी सृष्टि और संहार भी मेरे ही द्वारा होते हैं।। १४।।
अधर्मे वर्तमानानां सर्वेषामहमच्युतः ॥ १५ ॥ धर्मस्य सेतुं बध्नामि चलिते चलिते युगे । तास्ता योनीः प्रविश्याहं प्रजानां हितकाम्यया ॥ १६ ॥ अधर्ममें लगे हुए सभी मनुष्योंको दण्ड देनेवाला और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाला ईश्वर मैं ही हूँ। जब-जब युगका परिवर्तन होता है, तब-तब मैं प्रजाकी भलाईके लिये भिन्न-भिन्न योनियोंमें प्रविष्ट होकर धर्ममर्यादाकी स्थापना करता हूँ ॥ १५-१६ ॥
यदा त्वहं देवयोनौ वर्तामि भृगुनन्दन । तदाहं देववत् सर्वमाचरामि न संशयः ॥ १७ ॥ भृगुनन्दन! जब मैं देवयोनिमें अवतार लेता हूँ, तब देवताओंकी ही भाँति सारे आचार-विचारका पालन करता हूँ, इसमें संशय नहीं है ॥ १७ ॥
यदा गन्धर्वयोनौ वा वर्तामि भृगुनन्दन । तदा गन्धर्ववत् सर्वमाचरामि न संशयः ॥ १८ ॥ भृगुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले महर्षे! जब मैं गन्धर्व-योनिमें प्रकट होता हूँ, तब मेरे सारे आचार-विचार गन्धर्वोंके ही समान होते हैं, इसमें संदेह नहीं है ।।
नागयोनौ यदा चैव तदा वर्तामि नागवत् । यक्षराक्षसयोन्योस्तु यथावद् विचराम्यहम् ॥ १९ ॥ जब मैं नागयोनिमें जन्म ग्रहण करता हूँ, तब नागोंकी तरह बर्ताव करता हूँ। यक्षों और राक्षसोंकी योनियोंमें प्रकट होनेपर उन्हींके आचार-विचारका यथावत् रूपसे पालन करता हूँ ।। १९ ।।
मानुष्ये वर्तमाने तु कृपणं याचिता मया । न च ते जातसम्मोहा वचोऽगृह्णन्त मे हितम् ॥ २० ॥ इस समय मैं मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण हुआ हूँ, इसलिये कौरवोंपर अपनी ईश्वरीय शक्तिका प्रयोग न करके पहले मैंने दीनतापूर्वक ही संधिके लिये प्रार्थना की थी; परंतु उन्होंने मोहग्रस्त होनेके कारण मेरी हितकर बात नहीं मानी ॥ २० ॥