भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1853, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1853

महाराज! मुनिके इनकार करते ही कुत्तोंसहित वह चाण्डाल वहीं अन्तर्धान हो गया। यह देख उत्तंक मन-ही-मन बहुत लज्जित हुए और सोचने लगे कि ‘शत्रुघाती श्रीकृष्णने मुझे ठग लिया’ ॥ २२१/२ ॥

अथ तेनैव मार्गेण शङ्खचक्रगदाधरः ॥ २३ ॥
आजगाम महाबुद्धिरुत्तङ्कश्चैनमब्रवीत् ।
न युक्तं तादृशं दातुं त्वया पुरुषसत्तम ॥ २४ ॥
सलिलं विप्रमुख्येभ्यो मातङ्गस्रोतसा विभो ।

तदनन्तर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उसी मार्गसे प्रकट होकर आये। उन्हें देखकर महामति उत्तंकने कहा—‘पुरुषोत्तम! प्रभो! आपको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये चाण्डालसे स्पर्श किया हुआ वैसा अपवित्र जल देना उचित नहीं है’ ॥ २३-२४१/२ ॥

इत्युक्तवचनं तं तु महाबुद्धिर्जनार्दनः ॥ २५ ॥
उत्तङ्कं श्लक्ष्णया वाचा सान्त्वयन्निदमब्रवीत् ।

उत्तंकके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् जनार्दनने उन्हें मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना देते हुए कहा— ॥ २५१/२ ॥

यादृशेनेह रूपेण योग्यं दातुं धृतेन वै ॥ २६ ॥
तादृशं खलु ते दत्तं यच्च त्वं नावबुध्यथाः ।

‘महर्षे! वहाँ जैसा रूप धारण करके वह जल आपके लिये देना उचित था, उसी रूपसे दिया गया; किंतु आप उसे समझ न सके ॥ २६१/२ ॥

मया त्वदर्थमुक्तो वै वज्रपाणिः पुरंदरः ॥ २७ ॥
उत्तङ्कायामृतं देहि तोयरूपमिति प्रभुः ।
स मामुवाच देवेन्द्रो न मर्त्योऽमर्त्यतां व्रजेत् ॥ २८ ॥
अन्यमस्मै वरं देहीत्यसकृद् भृगुनन्दन ।
अमृतं देयमित्येव मयोक्तः स शचीपतिः ॥ २९ ॥

‘भृगुनन्दन! मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्रसे जाकर कहा था कि तुम उत्तंक मुनिको जलके रूपमें अमृत प्रदान करो। मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्रने बारम्बार मुझसे कहा कि ‘मनुष्य अमर नहीं हो सकता। इसलिये आप उन्हें अमृत न देकर और कोई वर दीजिये।’ परंतु मैंने शचीपति इन्द्रसे जोर देकर कहा कि उत्तङ्कको तो अमृत ही देना है ॥ २७—२९ ॥

स मां प्रसाद्य देवेन्द्रः पुनरेवेदमब्रवीत् ।
यदि देयमवश्यं वै मातङ्गोऽहं महामते ॥ ३० ॥
भूत्वामृतं प्रदास्यामि भार्गवाय महात्मने ।
यद्येवं प्रतिगृह्णाति भार्गवोऽमृतमद्य वै ॥ ३१ ॥