भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1854, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1854

प्रदातुमेष गच्छामि भार्गवस्यामृतं विभो । प्रत्याख्यातस्त्वहं तेन दास्यामि न कथंचन ॥ ३२ ॥ 'तब देवराज इन्द्र मुझे प्रसन्न करके बोले—'सर्वव्यापी महामते! यदि भृगुनन्दन महात्मा उत्तंकको अमृत अवश्य देना है तो मैं चाण्डालका रूप धारण करके उन्हें अमृत प्रदान करूँगा। यदि इस प्रकार आज भृगुवंशी उत्तंक अमृत लेना स्वीकार करेंगे तो मैं उन्हें वर देनेके लिये अभी जा रहा हूँ और यदि वे अस्वीकार कर देंगे तो मैं किसी तरह उन्हें अमृत नहीं दूँगा' ।। ३०–३२ ।।

स तथा समयं कृत्वा तेन रूपेण वासवः । उपस्थितस्त्वया चापि प्रत्याख्यातोऽमृतं ददत् ॥ ३३ ॥ 'इस तरहकी शर्त करके साक्षात् इन्द्र चाण्डालके रूपमें यहाँ उपस्थित हुए थे और आपको अमृत दे रहे थे; परंतु आपने उन्हें ठुकरा दिया ।। ३३ ।।

चाण्डालरूपी भगवान् सुमहांस्ते व्यतिक्रमः । यत् तु शक्यं मया कर्तुं भूय एव तवेप्सितम् ॥ ३४ ॥ 'आपने चाण्डालरूपधारी भगवान् इन्द्रको ठुकराया है, यह आपका महान् अपराध है। अच्छा, आपकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मैं पुनः जो कुछ कर सकता हूँ, करूँगा ।। ३४ ।।

तोयेप्सां तव दुर्धर्षां करिष्ये सफलामहम् । येष्वहःसु च ते ब्रह्मन् सलिलेप्सा भविष्यति ॥ ३५ ॥ तदा मरौ भविष्यन्ति जलपूर्णाः पयोधराः । रसवच्च प्रदास्यन्ति तोयं ते भृगुनन्दन ॥ ३६ ॥ उत्तङ्कमेघा इत्युक्ताः ख्यातिं यास्यन्ति चापि ते । 'ब्रह्मन्! आपकी तीव्र पिपासाको मैं अवश्य सफल करूँगा। जिन दिनों आपको जल पीनेकी इच्छा होगी, उन्हीं दिनों मरुप्रदेशमें जलसे भरे हुए मेघ प्रकट होंगे। भृगुनन्दन! वे आपको सरस जल प्रदान करेंगे और इस पृथ्वीपर उत्तंक मेघके नामसे विख्यात होंगे' ।।

इत्युक्तः प्रीतिमान् विप्रः कृष्णेन स बभूव ह । अद्याप्युत्तङ्कमेघाश्च मरौ वर्षन्ति भारत ॥ ३७ ॥ भारत! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर विप्रवर उत्तंक मुनि बड़े प्रसन्न हुए। इस समय भी मरुभूमिमें उत्तंक मेघ प्रकट होकर जलकी वर्षा करते हैं ।। ३७ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तङ्कोपाख्यानमें कृष्णवाक्यविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५५ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं)