महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1858, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकस्मात् तात तवाद्येह शोकोत्तरमिदं मनः । स स्वैरं ब्रूहि विप्रर्षे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १४ ॥ फिर गौतमने प्रसन्नचित्त होकर विप्रवर उत्तंकसे पूछा—‘बेटा! आज तुम्हारा मन शोकसे व्याकुल क्यों हो रहा है? मैं इसका यथार्थ कारण सुनना चाहता हूँ। ब्रह्मर्षे! तुम निःसंकोच होकर सारी बातें बताओ’ ॥ १४ ॥
उत्तङ्क उवाच भवद्गतेन मनसा भवत्प्रियचिकीर्षया । भवद्भक्तिगतेनेह भवद्भावानुगेन च ॥ १५ ॥ जरेयं नावबुद्धा मे नाभिज्ञातं सुखं च मे । शतवर्षोषितं मां हि न त्वमभ्यनुजानिथाः ॥ १६ ॥ उत्तंकने कहा—गुरुदेव! मेरा मन सदा आपमें लगा रहा। आपहीका प्रिय करनेकी इच्छासे मैं निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहा, मेरा सम्पूर्ण अनुराग आपहीमें रहा है और आपहीकी भक्तिमें तत्पर रहकर मैंने न तो लौकिक सुखको जाना और न मुझे आये हुए इस बुढ़ापाका ही पता चला। मुझे यहाँ रहते हुए सौ वर्ष बीत गये तो भी आपने मुझे घर जानेकी आज्ञा नहीं दी ॥ १५-१६ ॥
भवता त्वभ्यनुज्ञाताः शिष्याः प्रत्यवरा मम । उपपन्ना द्विजश्रेष्ठ शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १७ ॥ द्विजश्रेष्ठ! मेरे बाद सैकड़ों और हजारों शिष्य आपकी सेवामें आये और अध्ययन पूरा करके आपकी आज्ञा लेकर चले गये (केवल मैं ही यहाँ पड़ा हुआ हूँ) ॥ १७ ॥
गौतम उवाच त्वत्प्रीतियुक्तेन मया गुरुशुश्रूषया तव । व्यतिक्रामन्महाकालो नावबुद्धो द्विजर्षभ ॥ १८ ॥ गौतमने कहा— विप्रवर! तुम्हारी गुरुशुश्रूषासे तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा प्रेम हो गया था। इसीलिये इतना अधिक समय बीत गया तो भी मेरे ध्यानमें यह बात नहीं आयी ॥ १८ ॥
किं त्वद्य यदि ते श्रद्धा गमनं प्रति भार्गव । अनुज्ञां प्रतिगृह्य त्वं स्वगृहान् गच्छ मा चिरम् ॥ १९ ॥ भृगुनन्दन! यदि आज तुम्हारे मनमें यहाँसे जानेकी इच्छा हुई है तो मेरी आज्ञा स्वीकार करो और शीघ्र ही यहाँसे अपने घरको चले जाओ ॥ १९ ॥
उत्तङ्क उवाच गुर्वर्थं कं प्रयच्छामि ब्रूहि त्वं द्विजसत्तम । तमुपाहृत्य गच्छेयमनुज्ञातस्त्वया विभो ॥ २० ॥