भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1859, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1859

उत्तंकने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! प्रभो! मैं आपको गुरुदक्षिणामें क्या दूँ? यह बताइये। उसे आपको अर्पित करके आज्ञा लेकर घरको जाऊँ ॥ २० ॥

गौतम उवाच

दक्षिणा परितोषो वै गुरूणां सद्भिरुच्यते ।
तव ह्याचरतो ब्रह्मंस्तुष्टोऽहं वै न संशयः ॥ २१ ॥
गौतमने कहा— ब्रह्मन्! सत्पुरुष कहते हैं कि गुरुजनोंको संतुष्ट करना ही उनके लिये सबसे उत्तम दक्षिणा है। तुमने जो सेवा की है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥

इत्थं च परितुष्टं मां विजानीहि भृगूद्वह ।
युवा षोडशवर्षो हि यद्यद्य भविता भवान् ॥ २२ ॥
ददानि पत्नीं कन्यां च स्वां ते दुहितरं द्विज ।
एतामृतेऽङ्गना नान्या त्वत्तेजोऽर्हति सेवितुम् ॥ २३ ॥
भृगुकुलभूषण! इस तरह तुम मुझे पूर्ण संतुष्ट जानो। यदि आज तुम सोलह वर्षके तरुण हो जाओ तो मैं तुम्हें पत्नीरूपसे अपनी कुमारी कन्या अर्पित कर दूँगा; क्योंकि इसके सिवा दूसरी कोई स्त्री तुम्हारे तेजको नहीं सह सकती ॥ २२-२३ ॥

ततस्तां प्रतिजग्राह युवा भूत्वा यशस्विनीम् ।
गुरुणा चाभ्यनुज्ञातो गुरुपत्नीमथाब्रवीत् ॥ २४ ॥
तब उत्तंकने तपोबलसे तरुण होकर उस यशस्विनी गुरुपुत्रीका पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात् गुरुकी आज्ञा पाकर वे गुरुपत्नीसे बोले— ॥ २४ ॥

कं भवत्यै प्रयच्छामि गुर्वर्थं विनियुङ्क्ष्व माम् ।
प्रियं हितं च काङ्क्षामि प्राणैरपि धनैरपि ॥ २५ ॥
‘माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं गुरुदक्षिणामें आपको क्या दूँ? अपना धन और प्राण देकर भी मैं आपका प्रिय एवं हित करना चाहता हूँ ॥ २५ ॥

यद् दुर्लभं हि लोकेऽस्मिन् रत्नमत्यद्भुतं महत् ।
तदानयेयं तपसा न हि मेऽत्रास्ति संशयः ॥ २६ ॥
‘इस लोकमें जो अत्यन्त दुर्लभ, अद्भुत एवं महान् रत्न हो, उसे भी मैं तपस्याके बलसे ला सकता हूँ; इसमें संशय नहीं है’ ॥ २६ ॥

अहल्योवाच

परितुष्टास्मि ते विप्र नित्यं भक्त्या तवानघ ।
पर्याप्तमेतद् भद्रं ते गच्छ तात यथेप्सितम् ॥ २७ ॥
अहल्या बोली— निष्पाप ब्राह्मण! मैं तुम्हारे भक्ति-भावसे सदा संतुष्ट हूँ। बेटा! मेरे लिये इतना ही बहुत है। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ ॥ २७ ॥