महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1903, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘हम बुद्धि, वाणी और क्रियाद्वारा आराधनापूर्वक देवाधिदेव महादेव तथा उनके
अनुचरोंको प्रसन्न करके निश्चय ही उस धनको प्राप्त कर लेंगे ।। १४ १/२ ।।
रक्षन्ते ये च तद् द्रव्यं किन्नरा रौद्रदर्शनाः ।। १५ ।।
ते च वश्या भविष्यन्ति प्रसन्ने वृषभध्वजे ।
‘जो रौद्ररूपधारी किन्नर उस धनकी रक्षा करते हैं, वे भी भगवान् शंकरके प्रसन्न
होनेपर हमारे अधीन हो जायेंगे ।। १५ १/२ ।।
(स हि देवः प्रसन्नात्मा भक्तानां परमेश्वरः ।
ददात्यमरतां चापि किं पुनः काञ्चनं प्रभुः ।।
‘सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले वे सर्वसमर्थ परमेश्वर महादेव अपने भक्तोंको अमरत्व भी दे
देते हैं; फिर सुवर्णकी तो बात ही क्या? ।।
वनस्थस्य पुरा जिष्णोरस्त्रं पाशुपतं महत् ।
रौद्रं ब्रह्मशिरश्चादात् प्रसन्नः किं पुनर्धनम् ।।
‘पूर्वकालमें वनमें रहते समय अर्जुनपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने उन्हें महान्
पाशुपतास्त्र, रौद्रास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र भी प्रदान किये थे। फिर धन दे देना उनके लिये कौन
बड़ी बात है ।।
वयं सर्वे च तद्भक्ताः स चास्माकं प्रसीदति ।
तत्प्रसादाद् वयं राज्यं प्राप्ताः कौरवनन्दन ।।
अभिमन्योर्वधे वृत्ते प्रतिज्ञाते धनंजये ।
जयद्रथवधार्थाय स्वप्ने लोकगुरुं निशि ।।
प्रसाद्य लब्धवानस्त्रमर्जुनः सहकेशवः ।
‘कौरवनन्दन! हम सब लोग उनके भक्त हैं और वे हम लोगोंपर प्रसन्न रहते हैं। उन्हींकी
कृपासे हमने राज्य प्राप्त किया है। अभिमन्युका वध हो जानेपर जब अर्जुनने जयद्रथको
मारनेकी प्रतिज्ञा की थी, उस समय स्वप्नमें अर्जुनने श्रीकृष्णके साथ रहकर रातमें उन्हीं
लोकगुरु महेश्वरको प्रसन्न करके दिव्यास्त्र प्राप्त किया था ।।
ततः प्रभातां रजनीं फाल्गुनस्याग्रतः प्रभुः ।।
जघान सैन्यं शूलेन प्रत्यक्षं सव्यसाचिनः ।
‘तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब भगवान् शिवने अर्जुनके आगे
रहकर अपने त्रिशूलसे शत्रुओंकी सेनाका संहार किया था। यह बात अर्जुनने प्रत्यक्ष देखी
थी ।।
कस्तां सेनां महाराज मनसापि प्रधर्षयेत् ।।
द्रोणकर्णमुखैर्युक्तां महेष्वासैः प्रहारिभिः ।
ऋते देवान्महेष्वासाद् बहुरूपान्महेश्वरात् ।।