महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1904, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘महाराज! द्रोणाचार्य और कर्ण-जैसे प्रहारकुशल महाधनुर्धरोंसे युक्त उस कौरवसेनाको महान् पाशुपतधारी अनेक रूपवाले महेश्वर महादेवके सिवा दूसरा कौन मनसे भी पराजित कर सकता था।। तस्यैव च प्रसादेन निहताः शत्रवस्तव । अश्वमेधस्य संसिद्धिं स तु सम्पादयिष्यति ॥) ‘उन्हींके कृपाप्रसादसे आपके शत्रु मारे गये हैं। वे ही अश्वमेध यज्ञको सफलतापूर्वक सम्पन्न करेंगे’ ।। श्रुत्वैवं वदतस्तस्य वाक्यं भीमस्य भारत ।। १६ ।। प्रीतो धर्मात्मजो राजा बभूवातीव भारत । अर्जुनप्रमुखाश्चापि तथेत्येवाब्रुवन् वचः ।। १७ ।। भारत! भीमसेनका यह कथन सुनकर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन आदिने भी बहुत ठीक कहकर उन्हींकी बातका समर्थन किया ।। १६-१७ ।। कृत्वा तु पाण्डवाः सर्वे रत्नहरणनिश्चयम् । सेनामाज्ञापयामासुर्नक्षत्रेऽहनि च ध्रुवे ।। १८ ।। इस प्रकार समस्त पाण्डवोंने रत्न लानेका निश्चय करके ध्रुवसंज्ञक* नक्षत्र एवं दिनमें सेनाको यात्राके लिये तैयार होनेकी आज्ञा दी ।। १८ ।। ततो ययुः पाण्डुसुता ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च । अर्चयित्वा सुरश्रेष्ठं पूर्वमेव महेश्वरम् ।। १९ ।। मोदकैः पायसेनाथ मांसापूपैस्तथैव च । आशास्य च महात्मानं प्रययुर्मुदिता भृशम् ।। २० ।। तदनन्तर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर सुरश्रेष्ठ महेश्वरकी पहले ही पूजा करके मिष्टान्न, खीर, पूआ तथा मांसके पूपोंसे उन महेश्वरको तृप्त करके उनका आशीर्वाद ले समस्त पाण्डवोंने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक यात्रा प्रारम्भ की ।। १९-२० ।। तेषां प्रयास्यतां तत्र मङ्गलानि शुभान्यथ । प्राहुः प्रहृष्टमनसो द्विजाग्र्या नागराश्च ते ।। २१ ।। जब वे यात्राके लिये उद्यत हुए, उस समय समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों और नागरिकोंने प्रसन्नचित्त होकर उनके लिये शुभ मंगल-पाठ किया ।। २१ ।। ततः प्रदक्षिणीकृत्य शिरोभिः प्रणिपत्य च । ब्राह्मणानग्निसहितान् प्रययुः पाण्डुनन्दनाः ।। २२ ।। तत्पश्चात् पाण्डवोंने अग्निसहित ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर वहाँसे प्रस्थान किया ।। २२ ।। समनुज्ञाप्य राजानं पुत्रशोकसमाहतम् । धृतराष्ट्रं सभार्यं वै पृथां च पृथुलोचनाम् ।। २३ ।।