महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1949, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवीर अर्जुनने ऐसा इसलिये कहा कि चलते समय धर्मराज युधिष्ठिरने यह कहकर मना कर दिया था कि ‘कुन्तीनन्दन! जिन राजाओंके भाई-बन्धु कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये हैं, उनका तुम्हें वध नहीं करना चाहिये’ ॥ ७ ॥ स तदा तद् वचः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः । तान् निवर्तध्वमित्याह न न्यवर्तन्त चापि ते ॥ ८ ॥ बुद्धिमान् धर्मराजके इस आदेशको सुनकर उसका पालन करते हुए ही अर्जुनने त्रिगर्तोंको लौट जानेकी आज्ञा दी तथापि वे नहीं लौटे ॥ ८ ॥ ततस्त्रिगर्तराजानं सूर्यवर्माणमाहवे । विचित्य शरजालेन प्रजहास धनंजयः ॥ ९ ॥ तब उस युद्धस्थलमें त्रिगर्तराज सूर्यवर्माके सारे अंगोंमें बाण धँसाकर अर्जुन हँसने लगे ॥ ९ ॥ ततस्ते रथघोषेण रथनेमिस्वनेन च । पूरयन्तो दिशः सर्वा धनंजयमुपाद्रवन् ॥ १० ॥ यह देख त्रिगर्तदेशीय वीर रथकी घरघराहट और पहियोंकी आवाजसे सारी दिशाओंको गूँजाते हुए वहाँ अर्जुनपर टूट पड़े ॥ १० ॥ सूर्यवर्मा ततः पार्थे शराणां नतपर्वणाम् । शतान्यमुञ्चद् राजेन्द्र लघ्वस्त्रमभिदर्शयन् ॥ ११ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर सूर्यवर्माने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक सौ बाणोंका प्रहार किया ॥ ११ ॥ तथैवान्ये महेष्वासा ये च तस्यानुयायिनः । मुमुचुः शरवर्षाणि धनंजयवधैषिणः ॥ १२ ॥ इसी प्रकार उसके अनुयायी वीरोंमें भी जो दूसरे-दूसरे महान् धनुर्धर थे, वे भी अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १२ ॥ स तान् ज्यामुखनिर्मुक्तैर्बहुभिः सुबहून् शरान् । चिच्छेद पाण्डवो राजंस्ते भूमौ न्यपतंस्तदा ॥ १३ ॥ राजन्! पाण्डुपुत्र अर्जुनने अपने धनुषकी प्रत्यंचासे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंद्वारा शत्रुओंके बहुत-से बाणोंको काट डाला। वे कटे हुए बाण टुकड़े-टुकड़े होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १३ ॥ केतुवर्मा तु तेजस्वी तस्यैवावरजो युवा । युयुधे भ्रातुरर्थाय पाण्डवेन यशस्विना ॥ १४ ॥ (सूर्यवर्माके परास्त होनेपर) उसका छोटा भाई केतुवर्मा जो एक तेजस्वी नवयुवक था, अपने भाईका बदला लेनेके लिये यशस्वी वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा ॥ १४ ॥