भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1950, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1950

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य केतुवर्माणमाहवे । अभ्यघ्नन्निशितैर्बाणैर्बीभत्सुः परवीरहा ॥ १५ ॥ केतुवर्माको युद्धस्थलमें धावा करते देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे उसे मार डाला ॥ १५ ॥

केतुवर्माण्यभिहते धृतवर्मा महारथः । रथेनाशु समुत्पत्य शरैर्जिष्णुमवाकिरत् ॥ १६ ॥ केतुवर्माके मारे जानेपर महारथी धृतवर्मा रथके द्वारा शीघ्र ही वहाँ आ धमका और अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १६ ॥

तस्य तां शीघ्रतामीक्ष्य तुतोषातीव वीर्यवान् । गुडाकेशो महातेजा बालस्य धृतवर्मणः ॥ १७ ॥ धृतवर्मा अभी बालक था तो भी उसकी उस फुर्तीको देखकर महातेजस्वी पराक्रमी अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए ॥

न संदधानं ददृशे नाददानं च तं तदा । किरन्तमेव स शरान् ददृशे पाकशासनिः ॥ १८ ॥ वह कब बाण हाथमें लेता है और कब उसे धनुषपर चढ़ाता है, उसको इन्द्रकुमार अर्जुन भी नहीं देख पाते थे। उन्हें केवल इतना ही दिखायी देता था कि वह बाणोंकी वर्षा कर रहा है ॥ १८ ॥

स तु तं पूजयामास धृतवर्माणमाहवे । मनसा तु मुहूर्तं वै रणे समभिहर्षयन् ॥ १९ ॥ उन्होंने रणभूमिमें थोड़ी देरतक मन-ही-मन धृतवर्माकी प्रशंसा की और युद्धमें उसका हर्ष एवं उत्साह बढ़ाते रहे ॥ १९ ॥

तं पन्नगमिव क्रुद्धं कुरुवीरः स्मयन्निव । प्रीतिपूर्वं महाबाहुः प्राणैर्न व्यपरोपयत् ॥ २० ॥ यद्यपि धृतवर्मा सर्पके समान क्रोधमें भरा हुआ था तो भी कुरुवीर महाबाहु अर्जुन प्रेमपूर्वक मुसकराते हुए युद्ध करते थे। उन्होंने उसके प्राण नहीं लिये ॥ २० ॥

स तथा रक्ष्यमाणो वै पार्थेनामिततेजसा । धृतवर्मा शरं दीप्तं मुमोच विजये तदा ॥ २१ ॥ इस प्रकार अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा जानबूझकर छोड़ दिये जानेपर धृतवर्माने उनके ऊपर एक अत्यन्त प्रज्वलित बाण चलाया ॥ २१ ॥

स तेन विजयस्तूर्णमासीद् विद्धः करे भृशम् । मुमोच गाण्डिवं मोहात् तत् पपाताथ भूतले ॥ २२ ॥ उस बाणने तुरन्त आकर अर्जुनके हाथमें गहरी चोट पहुँचायी। उन्हें मूर्च्छा आ गयी और उनका गाण्डीव धनुष हाथसे छूटकर पृथ्वीपर जा पड़ा ॥ २२ ॥