भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 195

श्मशाने कस्य क्रीडार्थं नृत्ते वा कोऽभिभाष्यते ॥ २१८ ॥ इन्द्र! बताओ तो सही, किसके उत्कृष्ट स्थानकी देवताओंद्वारा प्रशंसा की जाती है? किसकी क्रीड़ाके लिये श्मशानभूमिमें स्थान नियत किया गया है? तथा ताण्डव-नृत्यमें कौन सर्वोपरि बताया जाता है ॥ २१८ ॥

कस्यैश्वर्यं समानं च भूतैः को वापि क्रीडते । कस्य तुल्यबला देव गणाश्चैश्वर्यदर्पिताः ॥ २१९ ॥ भगवान् शंकरके समान दूसरे किसका ऐश्वर्य है? कौन भूतोंके साथ क्रीड़ा करता है? देव! किसके पार्षदगण स्वामीके समान ही बलवान् और ऐश्वर्यपर अभिमान करनेवाले हैं? ॥ २१९ ॥

घुष्यते ह्यचलं स्थानं कस्य त्रैलोक्यपूजितम् । वर्षते तपते कोऽन्यो ज्वलते तेजसा च कः ॥ २२० ॥ किसका स्थान तीनों लोकोंमें पूजित और अविचल बताया जाता है। भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कौन वर्षा करता है? कौन तपता है? और कौन अपने तेजसे प्रज्वलित होता है? ॥ २२० ॥

कस्मादोषधिसम्पत्तिः को वा धारयते वसु । प्रकामं क्रीडते को वा त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ २२१ ॥ किससे ओषधियाँ—खेती-बारी या शस्य-सम्पत्ति बढ़ती है? कौन धनका धारण-पोषण करता है? कौन चराचर प्राणियोंसहित त्रिलोकीमें इच्छानुसार क्रीड़ा करता है? ॥ २२१ ॥

ज्ञानसिद्धिक्रियायोगैः सेव्यमानश्च योगिभिः । ऋषिगन्धर्वसिद्धैश्च विहितं कारणं परम् ॥ २२२ ॥ योगीजन ज्ञान, सिद्धि और क्रिया-योगद्वारा भगवान् शिवकी ही सेवा करते हैं तथा ऋषि, गन्धर्व और सिद्धगण उन्हें ही परम कारण मानकर उनका आश्रय लेते हैं ॥ २२२ ॥

कर्मयज्ञक्रियायोगैः सेव्यमानः सुरासुरैः । नित्यं कर्मफलैर्हीनं तमहं कारणं वदे ॥ २२३ ॥ देवता और असुर सब लोग कर्म, यज्ञ और क्रिया-योगद्वारा सदा जिनकी सेवा करते हैं, उन कर्मफलरहित महादेवजीको मैं सबका कारण कहता हूँ ॥ २२३ ॥

स्थूलं सूक्ष्ममनौपम्यमग्राह्यं गुणगोचरम् । गुणहीनं गुणाध्यक्षं परं माहेश्वरं पदम् ॥ २२४ ॥ महादेवजीका परमपद स्थूल, सूक्ष्म, उपमा-रहित, इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य, सगुण, निर्गुण तथा गुणोंका नियामक है ॥ २२४ ॥

विश्वेशं कारणगुरुं लोकालोकान्तकारणम् । भूताभूतभविष्यच्च जनकं सर्वकारणम् ॥ २२५ ॥ अक्षरक्षरमव्यक्तं विद्याविद्ये कृताकृते ।

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