महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्माधर्मौ यतः शक्र तमहं कारणं ब्रुवे ॥ २२६ ॥ इन्द्र! जो सम्पूर्ण विश्वके अधीश्वर, प्रकृतिके भी नियामक, लोक (जगत्की सृष्टि) तथा सम्पूर्ण लोकोंके संहारके भी कारण हैं, भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों काल जिनके ही स्वरूप हैं, जो सबके उत्पादक एवं कारण हैं, क्षर-अक्षर, अव्यक्त, विद्या-अविद्या, कृत-अकृत तथा धर्म और अधर्म जिनसे ही प्रकट हुए हैं, उन महादेवजीको ही मैं सबका परम कारण बताता हूँ ॥ २२५-२२६ ॥
प्रत्यक्षमिह देवेन्द्र पश्य लिङ्गं भगाङ्कितम् । देवदेवेन रुद्रेण सृष्टिसंहारहेतुना ॥ २२७ ॥ देवेन्द्र! सृष्टि और संहारके कारणभूत देवाधिदेव भगवान् रुद्रने जो भगचिह्नित लिङ्गमूर्ति धारण की है, उसे आप यहाँ प्रत्यक्ष देख लें। यह उनके कारण-स्वरूपका परिचायक है ॥ २२७ ॥
मात्रा पूर्वं ममाख्यातं कारणं लोकलक्षणम् । नास्ति चेशात् परं शक्र तं प्रपद्य यदिच्छसि ॥ २२८ ॥ इन्द्र! मेरी माताने पहले कहा था कि महादेवजीके अतिरिक्त अथवा उनसे बढ़कर कोई लोकरूपी कार्यका कारण नहीं है; अतः यदि किसी अभीष्ट वस्तुके पानेकी तुम्हारी इच्छा हो तो भगवान् शंकरकी ही शरण लो ॥ २२८ ॥
प्रत्यक्षं ननु ते सुरेश विदितं संयोगलिङ्गोद्भवं त्रैलोक्यं सविकारनिर्गुणं गणं ब्रह्मादिरेतोद्भवम् । यद्ब्रह्मेन्द्रहुताशविष्णुसहिता देवाश्च दैत्येश्वरा नान्यत् कामसहस्रकल्पितधियः शंसन्ति ईशात् परम् । तं देवं सचराचरस्य जगतो व्याख्यातवेद्योत्तमं कामार्थी वरयामि संयतमना मोक्षाय सद्यः शिवम् ॥ २२९ ॥ सुरेश्वर! तुम्हें प्रत्यक्ष विदित है कि ब्रह्मा आदि प्रजापतियोंके संकल्पसे उत्पन्न हुआ यह बद्ध और मुक्त जीवोंसे युक्त त्रिभुवन भग और लिङ्गसे प्रकट हुआ है तथा सहस्रों कामनाओंसे युक्त बुद्धिवाले तथा ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि एवं विष्णुसहित सम्पूर्ण देवता और दैत्यराज महादेवजीसे बढ़कर दूसरे किसी देवताको नहीं बताते हैं। जो सम्पूर्ण चराचर जगत्के लिये वेद-विख्यात सर्वोत्तम जाननेयोग्य तत्त्व हैं, उन्हीं कल्याणमय देव भगवान् शंकरका कामनापूर्तिके लिये वरण करता हूँ तथा संयतचित्त होकर सद्यःमुक्तिके लिये भी उन्हींसे प्रार्थना करता हूँ ॥ २२९ ॥
हेतुभिर्वा किमन्यैस्तैरीशः कारणकारणम् । न शुश्रुम यदन्यस्य लिङ्गमभ्यर्चितं सुरैः ॥ २३० ॥ दूसरे-दूसरे कारणोंको बतलानेसे क्या लाभ? भगवान् शंकर इसलिये भी समस्त कारणोंके भी कारण सिद्ध होते हैं कि हमने देवताओंद्वारा दूसरे किसीके लिंगको पूजित