भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 197

होते नहीं सुना है ॥ २३० ॥ कस्याप्यन्यस्य सुरैः सर्वैर्लिङ्गं मुक्त्वा महेश्वरम् । अर्च्यतेऽर्चितपूर्वं वा ब्रूहि यद्यस्ति ते श्रुतिः ॥ २३१ ॥ भगवान् महेश्वरको छोड़कर दूसरे किसके लिंगकी सम्पूर्ण देवता पूजा करते हैं अथवा पहले कभी उन्होंने पूजा की है? यदि तुम्हारे सुननेमें आया हो तो बताओ ॥ २३१ ॥ यस्य ब्रह्मा च विष्णुश्च त्वं चापि सह देवतैः । अर्चयध्वं सदा लिङ्गं तस्मात् श्रेष्ठतमो हि सः ॥ २३२ ॥ ब्रह्मा, विष्णु तथा सम्पूर्ण देवताओंसहित तुम सदा ही शिवलिंगकी पूजा करते आये हो; इसलिये भगवान् शिव ही सबसे श्रेष्ठतम देवता हैं ॥ २३२ ॥ न पद्माङ्का न चक्राङ्का न वज्राङ्का यतः प्रजाः । लिङ्गाङ्का च भगाङ्का च तस्मान्माहेश्वरी प्रजा ॥ २३३ ॥ प्रजाओंके शरीरमें न तो पद्मका चिह्न है, न चक्रका चिह्न है और न वज्रका ही चिह्न उपलक्षित होता है। सभी प्रजा लिंग और भगके चिह्नसे युक्त हैं, इसलिये यह सिद्ध है कि सम्पूर्ण प्रजा माहेश्वरी है (महादेवजीसे ही उत्पन्न हुई है) ॥ २३३ ॥ देव्याः कारणरूपभावजनिताः सर्वा भगाङ्काः स्त्रियो लिंगेनापि हरस्य सर्वपुरुषाः प्रत्यक्षचिह्नीकृताः । योऽन्यत्कारणमीश्वरात् प्रवदते देव्या च यन्नाङ्कितं त्रैलोक्ये सचराचरे स तु पुमान् बाह्यो भवेद् दुर्मतिः ॥ २३४ ॥ देवी पार्वतीके कारणस्वरूप भावसे संसारकी समस्त स्त्रियाँ उत्पन्न हुई हैं; इसलिये भगके चिह्नसे अंकित हैं और भगवान् शिवसे उत्पन्न होनेके कारण सभी पुरुष लिंगके चिह्नसे चिह्नित हैं—यह सबको प्रत्यक्ष है; ऐसी दशामें जो शिव और पार्वतीके अतिरिक्त अन्य किसीको कारण बताता है, जिससे कि प्रजा चिह्नित नहीं है, वह अन्य कारणवादी दुर्बुद्धि पुरुष चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंसे बाहर कर देने योग्य है ॥ २३४ ॥ पुंल्लिङ्गं सर्वमीशानं स्त्रीलिङ्गं विद्धि चाप्युमाम् । द्वाभ्यां तनुभ्यां व्याप्तं हि चराचरमिदं जगत् ॥ २३५ ॥ जितना भी पुँल्लिंग है, वह सब शिवस्वरूप है और जो भी स्त्रीलिंग है उसे उमा समझो। महेश्वर और उमा—इन दो शरीरोंसे ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है ॥ २३५ ॥ (दिवसकरशशाङ्कवह्निनेत्रं