महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिभुवनसारमपारमीशमाद्यम् । अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम् ॥) सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि जिनके नेत्र हैं, जो त्रिभुवनके सारतत्त्व, अपार, ईश्वर, सबके आदिकारण तथा अजर-अमर हैं, उन रुद्रदेवको प्रसन्न किये बिना इस संसारमें कौन पुरुष शान्ति पा सकता है ।।
तस्माद् वरमहं काङ्क्षे निधनं वापि कौशिक । गच्छ वा तिष्ठ वा शक्र यथेष्टं बलसूदन ॥ २३६ ॥ अतः कौशिक! मैं भगवान् शंकरसे ही वर अथवा मृत्यु पानेकी इच्छा रखता हूँ। बलसूदन इन्द्र! तुम जाओ या खड़े रहो, जैसी इच्छा हो करो ॥ २३६ ॥
काममेष वरो मेऽस्तु शापो वाथ महेश्वरात् । न चान्यां देवतां काङ्क्षे सर्वकामफलामपि ॥ २३७ ॥ मुझे महेश्वरसे चाहे वर मिले, चाहे शाप प्राप्त हो, स्वीकार है, परंतु दूसरा देवता यदि सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाला हो तो भी मैं उसे नहीं चाहता ॥ २३७ ॥
एवमुक्त्वा तु देवेन्द्रं दुःखदाकुलितेन्द्रियः । न प्रसीदति मे देवः किमेतदिति चिन्तयन् ॥ २३८ ॥ देवराज इन्द्रसे ऐसा कहकर मेरी इन्द्रियाँ दुःखसे व्याकुल हो उठीं और मैं सोचने लगा कि यह क्या कारण हो गया कि महादेवजी मुझपर प्रसन्न नहीं हो रहे हैं ॥ २३८ ॥
अथापश्यं क्षणेनैव तमैवैरावतं पुनः । हंसकुन्देन्दुसदृशं मृणालरजतप्रभम् ॥ २३९ ॥ वृषरूपधरं साक्षात् क्षीरोदमिव सागरम् । कृष्णपुच्छं महाकायं मधुपिङ्गललोचनम् ॥ २४० ॥ तदनन्तर एक ही क्षणमें मैंने देखा कि वही ऐरावत हाथी अब वृषभरूप धारण करके स्थित है। उसका वर्ण हंस, कुन्द और चन्द्रमाके समान श्वेत है। उसकी अंगकान्ति मृणालके समान उज्ज्वल और चाँदीके समान चमकीली है। जान पड़ता था साक्षात् क्षीरसागर ही वृषभरूप धारण करके खड़ा हो। काली पूँछ, विशाल शरीर और मधुके समान पिंगल वर्णवाले नेत्र शोभा पा रहे थे ॥ २३९-२४० ॥
वज्रसारमयैः शृङ्गैरैर्निष्टप्तकनकप्रभैः । सुतीक्ष्णैर्मृदुरक्ताग्रैरुत्किरन्तमिवावनिम् ॥ २४१ ॥ उसके सींग ऐसे जान पड़ते थे मानो वज्रके सारतत्त्वसे बने हों। उनसे तपाये हुए सुवर्णकी-सी प्रभा फैल रही थी। उन सींगोंके अग्रभाग अत्यन्त तीखे, कोमल तथा लाल रंगके थे। ऐसा लगता था मानो उन सींगोंके द्वारा वह इस पृथ्वीको विदीर्ण कर डालेगा ॥ २४१ ॥