महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 199, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजाम्बूनदेन दाम्ना च सर्वतः समलंकृतम् । सुवक्त्रखुरनासं च सुकर्णं सुकटीतटम् ॥ २४२ ॥ उसके शरीरको सब ओरसे जाम्बूनद नामक सुवर्णकी लड़ियोंसे सजाया गया था। उसके मुख, खुर, नासिका (नथुने), कान और कटीप्रदेश—सभी बड़े सुन्दर थे ॥ २४२ ॥
सुपार्श्वं विपुलस्कन्धं सुरूपं चारुदर्शनम् । ककुदं तस्य चाभाति स्कन्धमापूर्य धिष्ठितम् ॥ २४३ ॥ उसके अगल-बगलका भाग भी बड़ा मनोहर था। कंधे चौड़े और रूप सुन्दर था। वह देखनेमें बड़ा मनोहर जान पड़ता था। उसका ककुद् समूचे कंधेको घेरकर ऊँचे उठा था। उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २४३ ॥
तुषारगिरिकूटाभं सिताभ्रशिखरोपमम् । तमास्थितश्च भगवान् देवदेवः सहोमया ॥ २४४ ॥ अशोभत महादेवः पौर्णमास्यामिवोडुराट् । हिमालय पर्वतके शिखर अथवा श्वेत बादलोंके विशाल खण्डके समान प्रतीत होनेवाले उस नन्दिकेश्वरपर देवाधिदेव भगवान् महादेव भगवती उमाके साथ आरूढ़ हो पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ २४४ १/२ ॥
तस्य तेजोभवो वह्निः समेघः स्तनयित्नुमान् ॥ २४५ ॥ सहस्रमिव सूर्याणां सर्वमापूर्य धिष्ठितः । उनके तेजसे प्रकट हुई अग्निकी-सी प्रभा गर्जना करनेवाले मेघोंसहित सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करके सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशित हो रही थी ॥ २४५ १/२ ॥
ईश्वरः सुमहातेजाः संवर्तक इवानलः ॥ २४६ ॥ युगान्ते सर्वभूतानां दिधक्षुरिव चोद्यतः । वे महातेजस्वी महेश्वर ऐसे दिखायी देते थे मानो कल्पान्तके समय सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध कर देनेकी इच्छासे उद्यत हुई प्रलयकालीन अग्नि प्रज्वलित हो उठी हो ॥ २४६ १/२ ॥
तेजसा तु तदा व्याप्तं दुर्निरीक्ष्यं समन्ततः ॥ २४७ ॥ पुनरुद्विग्नहृदयः किमेतदिति चिन्तयन् । वे अपने तेजसे सब ओर व्याप्त हो रहे थे, अतः उनकी ओर देखना कठिन था। तब मैं उद्विग्नचित्त होकर फिर इस चिन्तामें पड़ गया कि यह क्या है? ॥ २४७ १/२ ॥
मुहूर्तमिव तत् तेजो व्याप्य सर्वा दिशो दश ॥ २४८ ॥ प्रशान्तं दिक्षु सर्वासु देवदेवस्य मायया । इतनेहीमें एक मुहूर्त बीतते-बीतते वह तेज सम्पूर्ण दिशाओंमें फैलकर देवाधिदेव महादेवजीकी मायासे सब ओर शान्त हो गया ॥ २४८ १/२ ॥
अथापश्यं स्थितं स्थाणुं भगवन्तं महेश्वरम् ॥ २४९ ॥