महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीलकण्ठं महात्मानमसक्तं तेजसां निधिम् । अष्टादशभुजं स्थाणुं सर्वाभरणभूषितम् ॥ २५० ॥ तत्पश्चात् मैंने देखा, भगवान् महेश्वर स्थिर भावसे खड़े हैं। उनके कण्ठमें नील चिह्न शोभा पा रहा था। वे महात्मा कहीं भी आसक्त नहीं थे। वे तेजकी निधि जान पड़ते थे। उनके अठारह भुजाएँ थीं। वे भगवान् स्थाणु समस्त आभूषणोंसे विभूषित थे ॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शुक्लमाल्यानुलेपनम् । शुक्लध्वजमनाधृष्यं शुक्लयज्ञोपवीतिनम् ॥ २५१ ॥ महादेवजीने श्वेत वस्त्र धारण कर रखा था। उनके श्रीअंगोंमें श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा था। उनकी ध्वजा भी श्वेत वर्णकी ही थी। वे श्वेत रंगका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले और अजेय थे ॥ २५१ ॥
गायद्भिर्नृत्यमानैश्च वादयद्भिश्च सर्वशः । वृतं पार्श्वचरैर्दिव्यैरात्मतुल्यपराक्रमैः ॥ २५२ ॥ वे अपने ही समान पराक्रमी दिव्य पार्षदोंसे घिरे हुए थे। उनके वे पार्षद सब ओर गाते, नाचते और बाजे बजाते थे ॥ २५२ ॥
बालेन्दुमुकुटं पाण्डुं शरच्चन्द्रमिवोदितम् । त्रिभिर्नेत्रैः कृतोद्योतं त्रिभिः सूर्यैरिवोदितैः ॥ २५३ ॥ भगवान् शिवके मस्तकपर बाल चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित था। उनकी अंग-कान्ति श्वेतवर्णकी थी। वे शरद्-ऋतुके पूर्ण चन्द्रमाके समान उदित हुए थे। उनके तीनों नेत्रोंसे ऐसा प्रकाश-पुञ्ज छा रहा था मानो तीन सूर्य उदित हुए हों ॥ २५३ ॥
(सर्वविद्याधिपं देवं शरच्चन्द्रसमप्रभम् । नयनाह्लादसौभाग्यमपश्यं परमेश्वरम् ॥) जो सम्पूर्ण विद्याओंके अधिपति, शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति कान्तिमान् तथा नेत्रोंके लिये परमानन्द-दायक सौभाग्य प्रदान करनेवाले थे। इस प्रकार मैंने परमेश्वर महादेवजीके मनोहर रूपको देखा ॥
अशोभतास्य देवस्य माला गात्रे सितप्रभे । जातरूपमयैः पद्मैर्ग्रथिता रत्नभूषिता ॥ २५४ ॥ भगवान्के उज्ज्वल प्रभाववाले गौर विग्रहपर सुवर्णमय कमलोंसे गुँथी हुई रत्नभूषित माला बड़ी शोभा पा रही थी ॥ २५४ ॥
मूर्तिमन्ति तथास्त्राणि सर्वतेजोमयानि च । मया दृष्टानि गोविन्द भवस्यामिततेजसः ॥ २५५ ॥ गोविन्द! मैंने अमित तेजस्वी महादेवजीके सम्पूर्ण तेजोमय आयुधोंको मूर्तिमान् होकर उनकी सेवामें उपस्थित देखा था ॥ २५५ ॥
इन्द्रायुधसवर्णाभं धनुस्तस्य महात्मनः ।