महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 201, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपिनाकमिति विख्यातमभवत् पन्नगो महान् ॥ २५६ ॥ उन महात्मा रुद्रदेवका इन्द्रधनुषके समान रंगवाला जो पिनाक नामसे विख्यात धनुष है, वह विशाल सर्पके रूपमें प्रकट हुआ था ॥ २५६ ॥ सप्तशीर्षो महाकायस्तीक्ष्णदंष्ट्रो विषोल्बणः । ज्यावेष्टितमहाग्रीवः स्थितः पुरुषविग्रहः ॥ २५७ ॥ उसके सात फन थे। उसका डीलडौल भी विशाल था। तीखी दाढ़ें दिखायी देती थीं। वह अपने प्रचण्ड विषके कारण मतवाला हो रहा था। उसकी विशाल ग्रीवा प्रत्यञ्चासे आवेष्टित थी। वह पुरुष-शरीर धारण करके खड़ा था ॥ २५७ ॥ शरश्च सूर्यसंकाशः कालानलसमद्युतिः । एतदस्त्रं महाघोरं दिव्यं पाशुपतं महत् ॥ २५८ ॥ भगवान्का जो बाण था वह सूर्य और प्रलयकालीन अग्निके समान प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित होता था। यही अत्यन्त भयंकर एवं महान् दिव्य पाशुपत अस्त्र था ॥ २५८ ॥ अद्वितीयमनिर्देश्यं सर्वभूतभयावहम् । सस्फुलिङ्गं महाकायं विसृजन्तमिवानलम् ॥ २५९ ॥ उसके जोड़का दूसरा अस्त्र नहीं था। समस्त प्राणियोंको भय देनेवाला वह विशालकाय अस्त्र अनिर्वचनीय जान पड़ता था और अपने मुखसे चिनगारियोंसहित अग्निकी वर्षा कर रहा था ॥ २५९ ॥ एकपादं महादंष्ट्रं सहस्रशिरसोदरम् । सहस्रभुजजिह्वाक्षमुद्गिरन्तमिवानलम् ॥ २६० ॥ वह भी सर्पके ही आकारमें दृष्टिगोचर होता था। उसके एक पैर, बहुत बड़ी दाढ़ें, सहस्रों सिर, सहस्रों पेट, सहस्रों भुजा, सहस्रों जिह्वा और सहस्रों नेत्र थे। वह आग-सा उगल रहा था ॥ २६० ॥ ब्राह्मान्नारायणाच्चैन्द्रादाग्नेयादपि वारुणात् । यद् विशिष्टं महाबाहो सर्वशस्त्रविघातनम् ॥ २६१ ॥ महाबाहो! सम्पूर्ण शस्त्रोंका विनाश करनेवाला वह पाशुपत अस्त्र ब्राह्म, नारायण, ऐन्द्र, आग्नेय और वारुण अस्त्रसे भी बढ़कर शक्तिशाली था ॥ २६१ ॥ येन तत् त्रिपुरं दग्ध्वा क्षणाद् भस्मीकृतं पुरा । शरेणैकेन गोविन्द महादेवेन लीलया ॥ २६२ ॥ गोविन्द! उसीके द्वारा महादेवजीने लीलापूर्वक एक ही बाण मारकर क्षणभरमें दैत्योंके तीनों पुरोंको जलाकर भस्म कर दिया था ॥ २६२ ॥ निर्दहेत च यत् कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् । महेश्वरभुजोत्सृष्टं निमेषार्धान्न संशयः ॥ २६३ ॥