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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

भगवान् महेश्वरकी भुजाओंसे छूटनेपर वह अस्त्र चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण

त्रिलोकीको आधे निमेषमें ही भस्म कर देता है—इसमें संशय नहीं है ।। २६३ ।।

नावध्यो यस्य लोकेऽस्मिन् ब्रह्मविष्णुसुरेष्वपि ।

तदहं दृष्टवांस्तत्र आश्चर्यमिदमुत्तमम् ।। २६४ ।।

गुह्यमस्त्रवरं नान्यत् तत्तुल्यमधिकं हि वा ।

इस लोकमें जिस अस्त्रके लिये ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंमेंसे भी कोई अवध्य नहीं

है, उस परम उत्तम आश्चर्यमय पाशुपतास्त्रको मैंने यहाँ प्रत्यक्ष देखा था। वह श्रेष्ठ अस्त्र

परम गोपनीय है। उसके समान अथवा उससे बढ़कर भी दूसरा कोई श्रेष्ठ अस्त्र नहीं

है ।। २६४ १/२ ।।

यत् तच्छूलमिति ख्यातं सर्वलोकेषु शूलिनः ।। २६५ ।।

दारयेद् यां महीं कृत्स्नां शोषयेद् वा महोदधिम् ।

संहरेद् वा जगत् कृत्स्नं विसृष्टं शूलपाणिना ।। २६६ ।।

त्रिशूलधारी भगवान् शंकरका सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात जो वह त्रिशूल नामक अस्त्र है

वह शूलपाणि शंकरके द्वारा छोड़े जानेपर इस सारी पृथिवीको विदीर्ण कर सकता है,

महासागरको सुखा सकता है अथवा समस्त संसारका संहार कर सकता

है ।। २६५-२६६ ।।

यौवनाश्वो हतो येन मान्धाता सबलः पुरा ।

चक्रवर्ती महातेजास्त्रिलोकविजयी नृपः ।। २६७ ।।

महाबलो महावीर्यः शक्रतुल्यपराक्रमः ।

करस्थेनैव गोविन्द लवणस्येह रक्षसः ।। २६८ ।।

श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें त्रिलोकविजयी, महातेजस्वी, महाबली, महान् वीर्यशाली,

इन्द्रतुल्य पराक्रमी चक्रवर्ती राजा मान्धाता लवणासुरके द्वारा प्रयुक्त हुए उस शूलसे ही

सेनासहित नष्ट हो गये थे। अभी वह अस्त्र उस असुरके हाथसे छूटने भी नहीं पाया था कि

राजाका सर्वनाश हो गया ।। २६७-२६८ ।।

तच्छूलमतितीक्ष्णाग्रं सुभीमं लोमहर्षणम् ।

त्रिशिखां भुकुटिं कृत्वा तर्जमानमिव स्थितम् ।। २६९ ।।

उस शूलका अग्रभाग अत्यन्त तीक्ष्ण है। वह बहुत ही भयंकर और रोमाञ्चकारी है,

मानो वह अपनी भौंहें तीन जगहसे टेढ़ी करके विरोधीको डाँट बता रहा हो, ऐसा जान

पड़ता है ।। २६९ ।।

विधूमं सार्चिषं कृष्णं कालसूर्यमिवोदितम् ।

सर्पहस्तमनिर्देश्यं पाशहस्तमिवान्तकम् ।। २७० ।।

दृष्टवानस्मि गोविन्द तदस्त्रं रुद्रसंनिधौ ।