महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1952, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिशोऽभिदुद्रुवू राजन् धनंजयशरार्दिताः ॥ ३१ ॥
राजन्! धनंजयके बाणोंसे पीड़ित हुए समस्त त्रिगर्तदेशीय महारथियोंका युद्धविषयक उत्साह नष्ट हो गया; अतः वे चारों दिशाओंमें भाग चले ॥ ३१ ॥
तमूचुः पुरुषव्याघ्रं संशप्तकनिषूदनम् ।
तवास्म किंकराः सर्वे सर्वे वै वशगास्तव ॥ ३२ ॥
उनमेंसे कितने ही संशप्तकसूदन पुरुषसिंह अर्जुनसे इस प्रकार कहने लगे—‘कुन्तीनन्दन! हम सब आपके आज्ञाकारी सेवक हैं और सभी सदा आपके अधीन रहेंगे ॥ ३२ ॥
आज्ञापयस्व नः पार्थ प्रह्वान् प्रेष्यानवस्थितान् ।
करिष्यामः प्रियं सर्वं तव कौरवनन्दन ॥ ३३ ॥
‘पार्थ! हम सभी सेवक विनीत भावसे आपके सामने खड़े हैं। आप हमें आज्ञा दें। कौरवनन्दन! हम सब लोग आपके समस्त प्रिय कार्य सदा करते रहेंगे’ ॥ ३३ ॥
एतदाज्ञाय वचनं सर्वांस्तानब्रवीत् तदा ।
जीवितं रक्षत नृपाः शासनं प्रतिगृह्यताम् ॥ ३४ ॥
उनकी ये बातें सुनकर अर्जुनने उनसे कहा—‘राजाओ! अपने प्राणोंकी रक्षा करो। इसका एक ही उपाय है, हमारा शासन स्वीकार कर लो’ ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि त्रिगर्तपराभवे
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें त्रिगर्तोकी पराजयविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥