भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1973, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1973

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एकोनाशीतितमोऽध्यायः

अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्ध एवं अर्जुनकी मृत्यु

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा तु नृपतिः प्राप्तं पितरं बभ्रुवाहनः ।
निर्ययौ विनयेनाथ ब्राह्मणार्थपुरःसरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मणिपुरनरेश बभ्रुवाहनने जब सुना कि मेरे पिता आये हैं, तब वह ब्राह्मणोंको आगे करके बहुत-सा धन साथमें लेकर बड़ी विनयके साथ उनके दर्शनके लिये नगरसे बाहर निकला ॥ १ ॥

मणिपूरेश्वरं त्वेवमुपयातं धनंजयः ।
नाभ्यनन्दत् स मेधावी क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ २ ॥
मणिपुर-नरेशको इस प्रकार आया देख परम बुद्धिमान् धनंजयने क्षत्रिय-धर्मका आश्रय लेकर उसका आदर नहीं किया ॥ २ ॥

उवाच च स धर्मात्मा समन्युः फाल्गुनस्तदा ।
प्रक्रियेयं न ते युक्ता बहिस्त्वं क्षत्रधर्मतः ॥ ३ ॥
उस समय धर्मात्मा अर्जुन कुछ कुपित होकर बोले—'बेटा! तेरा यह ढंग ठीक नहीं है। जान पड़ता है, तू क्षत्रिय-धर्मसे बहिष्कृत हो गया है ॥ ३ ॥

संरक्ष्यमाणं तुरगं यौधिष्ठिरमुपागतम् ।
यज्ञियं विषयान्ते मां नायौत्सीः किं नु पुत्रक ॥ ४ ॥
'पुत्र! मैं महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वकी रक्षा करता हुआ तेरे राज्यके भीतर आया हूँ। फिर भी तू मुझसे युद्ध क्यों नहीं करता? ॥ ४ ॥

धिक् त्वामस्तु सुदुर्बुद्धिं क्षत्रधर्मबहिष्कृतम् ।
यो मां युद्धाय सम्प्राप्तं साम्नैव प्रत्यगृह्णथाः ॥ ५ ॥
'तुझ दुर्बुद्धिको धिक्कार है, तू निश्चय ही क्षत्रियधर्मसे भ्रष्ट हो गया है, क्योंकि युद्धके लिये आये हुए मेरा स्वागत-सत्कार तू सामनीतिसे कर रहा है ॥

न त्वया पुरुषार्थो हि कश्चिदस्तीह जीवता ।
यस्त्वं स्त्रीवद् यथाप्राप्तं मां साम्ना प्रत्यगृह्णथाः ॥ ६ ॥
'तूने संसारमें जीवित रहकर भी कोई पुरुषार्थ नहीं किया। तभी तो एक स्त्रीकी भाँति तू यहाँ युद्धके लिये आये हुए मुझे शान्तिपूर्वक साथ लेनेके लिये चेष्टा कर रहा है ॥ ६ ॥

यद्यहं न्यस्तशस्त्रस्त्वामागच्छेयं सुदुर्मते ।
प्रक्रियेयं भवेद् युक्ता तावत् तव नराधम ॥ ७ ॥