महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1974, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘दुर्बुद्धे! नराधम! यदि मैं हथियार रखकर खाली हाथ तेरे पास आता तो इस ढंगसे मिलना ठीक हो सकता था’ ।। ७ ।।
तमेवमुक्तं भर्त्रा तु विदित्वा पन्नगात्मजा ।
अमृष्यमाणा भित्त्वोर्वीमुलूपी समुपागमत् ।। ८ ।।
पतिदेव अर्जुन जब अपने पुत्र बभ्रुवाहनसे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय नागकन्या उलूपी उस बातको सुनकर उनके अभिप्रायको जान गयी और उनके द्वारा किये गये पुत्रके तिरस्कारको सहन न कर सकनेके कारण वह धरती छेदकर वहाँ चली आयी ।। ८ ।।
सा ददर्श ततः पुत्रं विमृशन्तमधोमुखम् ।
संतर्ज्यमानमसकृत् पित्रा युद्धार्थिना प्रभो ।। ९ ।।
ततः सा चारुसर्वाङ्गी समुपेत्योरगात्मजा ।
उलूपी प्राह वचनं धर्म्यं धर्मविशारदम् ।। १० ।।
प्रभो! उसने देखा कि पुत्र बभ्रुवाहन नीचे मुँह किये किसी सोच-विचारमें पड़ा हुआ है और युद्धार्थी पिता उसे बारंबार डाँट-फटकार रहे हैं। तब मनोहर अंगोंवाली नागकन्या उलूपी धर्म-निपुण बभ्रुवाहनके पास आकर यह धर्मसम्मत बात बोली— ।। ९-१० ।।
उलूपीं मां निबोध त्वं मातरं पन्नगात्मजाम् ।
कुरुष्व वचनं पुत्र धर्मस्ते भविता परः ।। ११ ।।
‘बेटा! तुम्हें विदित होना चाहिये कि मैं तुम्हारी विमाता नागकन्या उलूपी हूँ। तुम मेरी आज्ञाका पालन करो। इससे तुम्हें महान् धर्मकी प्राप्ति होगी’ ।। ११ ।।
युध्यस्वैनं कुरुश्रेष्ठं पितरं युद्धदुर्मदम् ।
एवमेष हि ते प्रीतो भविष्यति न संशयः ।। १२ ।।
‘तुम्हारे पिता कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर और युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले हैं। अतः इनके साथ अवश्य युद्ध करो। ऐसा करनेसे ये तुमपर प्रसन्न होंगे। इसमें संशय नहीं है’ ।। १२ ।।
एवं दुर्मर्षितो राजा स मात्रा बभ्रुवाहनः ।
मनश्चक्रे महातेजा युद्धाय भरतर्षभ ।। १३ ।।
भरतश्रेष्ठ! माताके द्वारा इस प्रकार अमर्ष दिलाये जानेपर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहनने मन-ही-मन युद्ध करनेका निश्चय किया ।। १३ ।।
संनह्य काञ्चनं वर्म शिरस्त्राणं च भानुमत् ।
तूणीरशतसम्बाधमारुरोह रथोत्तमम् ।। १४ ।।
सुवर्णमय कवच पहनकर तेजस्वी शिरस्त्राण (टोप) धारण करके वह सैकड़ों तरकसोंसे भरे हुए उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ ।। १४ ।।
सर्वोपकरणोपेतं युक्तमश्वैर्मनोजवैः ।
सचक्रोपस्करं श्रीमान् हेमभाण्डपरिष्कृतम् ।। १५ ।।
परमार्चितमुच्छ्रित्य ध्वजं सिंहं हिरण्मयम् ।