भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1980, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1980

कुछ देर बाद होशमें आनेपर दिव्यरूपधारिणी देवी चित्रांगदाने नागकन्या उलूपीको सामने खड़ी देख इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥ उलूपि पश्य भर्तारं शयानं निहतं रणे । त्वत्कृते मम पुत्रेण बाणेन समितिंजयम् ॥ ३ ॥ 'उलूपी! देखो, हम दोनोंके स्वामी मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हैं। तुम्हारी प्रेरणासे ही मेरे बेटेने समरविजयी अर्जुनका वध किया है ॥ ३ ॥ ननु त्वमार्यधर्मज्ञा ननु चासि पतिव्रता । यत्त्वत्कृतेऽयं पतितः पतिस्ते निहतो रणे ॥ ४ ॥ 'बहिन! तुम तो आर्यधर्मको जाननेवाली और पतिव्रता हो। तथापि तुम्हारी ही करतूतसे ये तुम्हारे पति इस समय रणभूमिमें मरे पड़े हैं ॥ ४ ॥ किंतु सर्वापराधोऽयं यदि तेऽद्य धनंजयः । क्षमस्व याच्यमाना वै जीवयस्व धनंजयम् ॥ ५ ॥ 'किंतु यदि ये अर्जुन सर्वथा तुम्हारे अपराधी हों तो भी आज क्षमा कर दो। मैं तुमसे इनके प्राणोंकी भीख माँगती हूँ। तुम धनंजयको जीवित कर दो ॥ ५ ॥ ननु त्वमार्ये धर्मज्ञा त्रैलोक्यविदिता शुभे । यद् घातयित्वा पुत्रेण भर्तारं नानुशोचसि ॥ ६ ॥ 'आर्ये! शुभे! तुम धर्मको जाननेवाली और तीनों लोकोंमें विख्यात हो। तो भी आज पुत्रसे पतिकी हत्या कराकर तुम्हें शोक या पश्चात्ताप नहीं हो रहा है, इसका क्या कारण है? ॥ ६ ॥ नाहं शोचामि तनयं हतं पन्नगनन्दिनि । पतिमेव तु शोचामि यस्यातिथ्यमिदं कृतम् ॥ ७ ॥ 'नागकुमारी! मेरा पुत्र भी मरा पड़ा है, तो भी मैं उसके लिये शोक नहीं करती। मुझे केवल पतिके लिये शोक हो रहा है, जिनका मेरे यहाँ इस तरह आतिथ्य-सत्कार किया गया' ॥ ७ ॥ इत्युक्त्वा सा तदा देवीमुलूपीं पन्नगात्मजाम् । भर्तारमभिगम्येदमित्युवाच यशस्विनी ॥ ८ ॥ नागकन्या उलूपीदेवीसे ऐसा कहकर यशस्विनी चित्राङ्गदा उस समय पतिके निकट गयी और उन्हें सम्बोधित करके इस प्रकार विलाप करने लगी— ॥ ८ ॥ उत्तिष्ठ कुरुमुख्यस्य प्रियमुख्य मम प्रिय । अयमश्वो महाबाहो मया ते परिमोक्षितः ॥ ९ ॥ 'कुरुराजके प्रियतम और मेरे प्राणाधार! उठो। महाबाहो! मैंने तुम्हारा यह घोड़ा छुड़वा दिया है ॥ ९ ॥ ननु त्वया नाम विभो धर्मराजस्य यज्ञियः ।