महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1981, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयमश्वोऽनुसर्तव्यः स शेषे किं महीतले ॥ १० ॥
‘प्रभो! तुम्हें तो महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वके पीछे-पीछे जाना है; फिर यहाँ पृथ्वीपर कैसे सो रहे हो? ॥ १० ॥
त्वयि प्राणा ममायत्ताः कुरूणां कुरुनन्दन ।
स कस्मात् प्राणदोऽन्येषां प्राणात् संत्यक्तवानसि ॥ ११ ॥
‘कुरुनन्दन! मेरे और कौरवोंके प्राण तुम्हारे ही अधीन हैं। तुम तो दूसरोंके प्राणदाता हो, तुमने स्वयं कैसे प्राण त्याग दिये?’ ॥ ११ ॥
उलूपि साधु पश्येमं पतिं निपतितं भुवि ।
पुत्रं चेमं समुत्साद्य घातयित्वा न शोचसि ॥ १२ ॥
(इतना कहकर वह फिर उलूपीसे बोली—) ‘उलूपी! ये पतिदेव भूतलपर पड़े हैं। तुम इन्हें अच्छी तरह देख लो। तुमने इस बेटेको उकसाकर स्वामीकी हत्या करायी है। क्या इसके लिये तुम्हें शोक नहीं होता? ॥ १२ ॥
कामं स्वपितु बालोऽयं भूमौ मृत्युवशं गतः ।
लोहिताक्षो गुडाकेशो विजयः साधु जीवतु ॥ १३ ॥
‘मृत्युके वशमें पड़ा हुआ मेरा यह बालक चाहे सदाके लिये भूमिपर सोता रह जाय, किंतु निद्राके स्वामी, विजय पानेवाले अरुणनयन अर्जुन अवश्य जीवित हों—यही उत्तम है ॥ १३ ॥
नापराधोऽस्ति सुभगे नराणां बहुभार्यता ।
प्रमदानां भवत्येष मा तेऽभूद् बुद्धिरीदृशी ॥ १४ ॥
‘सुभगे! कोई पुरुष बहुत-सी स्त्रियोंको पत्नी बनाकर रखे, तो उनके लिये यह अपराध या दोषकी बात नहीं होती। स्त्रियाँ यदि ऐसा करें (अनेक पुरुषोंसे सम्बन्ध रखें) तो यह उनके लिये अवश्य दोष या पापकी बात होती है। अतः तुम्हारी बुद्धि ऐसी क्रूर नहीं होनी चाहिये ॥ १४ ॥
सख्यं चैतत् कृतं धात्रा शश्वदव्ययमेव तु ।
सख्यं समभिजानीहि सत्यं सङ्गतमस्तु ते ॥ १५ ॥
‘विधाताने पति और पत्नीकी मित्रता सदा रहनेवाली और अटूट बनायी है। (तुम्हारा भी इनके साथ वही सम्बन्ध है।) इस सख्यभावके महत्त्वको समझो और ऐसा उपाय करो जिससे तुम्हारी इनके साथ की हुई मैत्री सत्य एवं सार्थक हो ॥ १५ ॥
पुत्रेण घातयित्वैनं पतिं यदि न मेऽद्य वै ।
जीवन्तं दर्शयस्यद्य परित्यक्ष्यामि जीवितम् ॥ १६ ॥
‘तुम्हींने बेटेको लड़ाकर उसके द्वारा इन पतिदेवकी हत्या करवायी है। यह सब करके यदि आज तुम पुनः इन्हें जीवित करके न दिखा दोगी तो मैं भी प्राण त्याग दूँगी ॥ १६ ॥
साहं दुःखान्विता देवि पतिपुत्रविनाकृता ।