महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2019, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुन्तीनन्दन अर्जुन सदा अधिक कष्ट भोगते हैं; परंतु उनके अंगोंमें कहीं कोई निन्दनीय दोष नहीं दिखायी देता है। ऐसी दशामें उन्हें कष्ट भोगनेका कारण क्या है? यह मैं सुनना चाहता हूँ। आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बात बतावें ।। ६ ।। इत्युक्तः स हृषीकेशो ध्यात्वा सुमहदुत्तरम् । राजानं भोजराजन्यवर्धनो विष्णुरब्रवीत् ।। ७ ।। युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भोजवंशी क्षत्रियोंकी वृद्धि करनेवाले भगवान् हृषीकेश विष्णुने बहुत देरतक उत्तम रीतिसे चिन्तन करनेके बाद राजा युधिष्ठिरसे यों कहा — ।। ७ ।। न ह्यस्य नृपते किंचित् संश्लिष्टमुपलक्षये । ऋते पुरुषसिंहस्य पिण्डिकेऽस्याधिके यतः ।। ८ ।। ‘नरेश्वर! पुरुषसिंह अर्जुनकी पिण्डलियाँ (फिल्लियाँ) औसतसे कुछ अधिक मोटी हैं। इसके सिवा और कोई अशुभ लक्षण उनके शरीरमें मुझे भी नहीं दिखायी देता है’ ।। ८ ।। स ताभ्यां पुरुषव्याघ्रो नित्यमध्वसु वर्तते । न चान्यदनुपश्यामि येनासौ दुःखभाजनम् ।। ९ ।। ‘उन मोटी फिल्लियोंके कारण ही पुरुषसिंह अर्जुनको सदा रास्ता चलना पड़ता है। और कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता, जिससे उन्हें दुःख झेलना पड़े’ ।। ९ ।। इत्युक्तः पुरुषश्रेष्ठस्तदा कृष्णेन धीमता । प्रोवाच वृष्णिशार्दूलमेवमेतदिति प्रभो ।। १० ।। प्रभो! बुद्धिमान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उन वृष्णिसिंहसे कहा —‘भगवन्! आपका कहना ठीक है’ ।। १० ।। कृष्णा तु द्रौपदी कृष्णं तिर्यक् सासूयमैक्षत । प्रतिजग्राह तस्यास्तं प्रणयं चापि केशहा ।। ११ ।। सख्युः सखा हृषीकेशः साक्षादिव धनंजयः । उस समय द्रुपदकुमारी कृष्णाने भगवान् श्रीकृष्णकी ओर तिरछी चितवनसे ईर्ष्यापूर्वक देखा। केशिहन्ता श्रीकृष्णने द्रौपदीके उस प्रेमपूर्ण उपालम्भको सानन्द ग्रहण किया; क्योंकि उसकी दृष्टिमें सखा अर्जुनके मित्र भगवान् हृषीकेश साक्षात् अर्जुनके ही समान थे ।। ११ ½ ।। तत्र भीमादयस्ते तु कुरवो याजकाश्च ये ।। १२ ।। रेमुः श्रुत्वा विचित्रां तां धनंजयकथां शुभाम् । उस समय भीमसेन आदि कौरव और यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणलोग अर्जुनके सम्बन्धमें यह शुभ एवं विचित्र बात सुनकर बहुत प्रसन्न हो रहे थे ।। १२ ½ ।। तेषां कथयतामेव पुरुषोऽर्जुनसंकथाः ।। १३ ।। उपायाद् वचनाद् दूतो विजयस्य महात्मनः ।