भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2020, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2020

उन लोगोंमें अर्जुनके सम्बन्धमें इस तरहकी बातें हो ही रही थीं कि महात्मा अर्जुनका भेजा हुआ दूत वहाँ आ पहुँचा ॥ १३ १/२ ॥ सोऽभिगम्य कुरुश्रेष्ठं नमस्कृत्य च बुद्धिमान् ॥ १४ ॥ उपायातं नरव्याघ्रं फाल्गुनं प्रत्यवेदयत् । वह बुद्धिमान् दूत कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके पास जा उन्हें नमस्कार करके बोला—‘पुरुषसिंह अर्जुन निकट आ गये हैं’ ॥ १४ १/२ ॥ तच्छ्रुत्वा नृपतिस्तस्य हर्षबाष्पाकुलेक्षणः ॥ १५ ॥ प्रियाख्याननिमित्तं वै ददौ बहुधनं तदा । यह शुभ समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक आये और यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करनेके कारण उस दूतको पुरस्काररूपमें उन्होंने बहुत-सा धन दिया ॥ १५ १/२ ॥ ततो द्वितीये दिवसे महान् शब्दो व्यवर्धत ॥ १६ ॥ आगच्छति नरव्याघ्रे कौरवाणां धुरंधरे । तदनन्तर दूसरे दिन कौरव-धुरंधर नरव्याघ्र अर्जुनके आते समय नगरमें महान् कोलाहल बढ़ गया ॥ १६ १/२ ॥ ततो रेणुः समुद्भूतो विबभौ तस्य वाजिनः ॥ १७ ॥ अभितो वर्तमानस्य यथोच्चैःश्रवसस्तथा । उच्चैःश्रवाके समान वेगवान् और पास ही विद्यमान उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेकी टापसे उड़ी हुई धूल आकाशमें अद्भुत शोभा पा रही थी ॥ १७ १/२ ॥ तत्र हर्षकरी वाचो नराणां शुश्रुवेऽर्जुनः ॥ १८ ॥ दिष्ट्यासि पार्थ कुशली धन्यो राजा युधिष्ठिरः । वहाँ अर्जुनने लोगोंके मुँहसे हर्ष बढ़ानेवाली बातें इस प्रकार सुनीं—‘पार्थ! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम सकुशल लौट आये। राजा युधिष्ठिर धन्य हैं ॥ कोऽन्यो हि पृथिवीं कृत्स्नां जित्वा हि युधि पार्थिवान् ॥ १९ ॥ चारयित्वा हयश्रेष्ठमुपागच्छेदृतेऽर्जुनात् । ‘अर्जुनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर पुरुष है जो समूची पृथिवीको जीतकर युद्धमें राजाओंको परास्त करके और अपने श्रेष्ठ अश्वको सर्वत्र घुमाकर उसके साथ सकुशल लौट आ सके ॥ १९ १/२ ॥ ये व्यतीता महात्मानो राजानः सगरादयः ॥ २० ॥ तेषामपीदृशं कर्म न कदाचन शुश्रुम । ‘अतीतकालमें जो सगर आदि महामनस्वी राजा हो गये हैं, उनका भी कभी ऐसा पराक्रम हमारे सुननेमें नहीं आया था ॥ २० १/२ ॥