महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2024, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंददौ कुन्ती ततस्ताभ्यां रत्नानि विविधानि च ॥ ३ ॥ फिर सुभद्रा तथा कुरुकुलकी अन्य स्त्रियोंसे भी वे यथायोग्य मिलीं। उस समय कुन्तीने उन दोनोंको नाना प्रकारके रत्न भेंटमें दिये ॥ ३ ॥
द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चाप्यन्याऽददुः स्त्रियः । ऊषतुस्तत्र ते देव्यौ महार्हशयनासने ॥ ४ ॥ द्रौपदी, सुभद्रा तथा अन्य स्त्रियोंने भी अपनी ओरसे नाना प्रकारके उपहार दिये। तत्पश्चात् वे दोनों देवियाँ बहुमूल्य शय्याओंपर विराजमान हुईं ॥ ४ ॥
सुपूजिते स्वयं कुन्त्या पार्थस्य हितकाम्यया । स च राजा महातेजाः पूजितो बभ्रुवाहनः ॥ ५ ॥ धृतराष्ट्रं महीपालमुपतस्थे यथाविधि । अर्जुनके हितकी कामनासे कुन्तीदेवीने स्वयं ही उन दोनोंका बड़ा सत्कार किया। कुन्तीसे सत्कार पाकर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहन महाराज धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुआ और उसने विधिपूर्वक उनका चरण-स्पर्श किया ॥ ५ १/२ ॥
युधिष्ठिरं च राजानं भीमादींश्चापि पाण्डवान् ॥ ६ ॥ उपागम्य महातेजा विनयेनाभ्यवादयत् । इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमसेन आदि सभी पाण्डवोंके पास जाकर उस महातेजस्वी नरेशने विनयपूर्वक उनका अभिवादन किया ॥ ६ १/२ ॥
स तैः प्रेम्णा परिष्वक्तः पूजितश्च यथाविधि ॥ ७ ॥ धनं चास्मै ददुर्भूरि प्रीयमाणा महारथाः । उन सब लोगोंने प्रेमवश उसे छातीसे लगा लिया और उसका यथोचित सत्कार किया। इतना ही नहीं, बभ्रुवाहनपर प्रसन्न हुए उन पाण्डव महारथियोंने उसे बहुत धन दिया ॥ ७ १/२ ॥
तथैव च महीपालः कृष्णं चक्रगदाधरम् ॥ ८ ॥ प्रद्युम्न इव गोविन्दं विनयेनोपतस्थिवान् । इसी प्रकार वह भूपाल प्रद्युम्नकी भाँति विनीत भावसे शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ ८ १/२ ॥
तस्मै कृष्णो ददौ राज्ञे महार्हमतिपूजितम् ॥ ९ ॥ रथं हेमपरिष्कारं दिव्याश्वयुजमुत्तमम् । श्रीकृष्णने इस राजाको एक बहुमूल्य रथ प्रदान किया जो सुनहरी साजोंसे सुसज्जित, सबके द्वारा अत्यन्त प्रशंसित और उत्तम था। उसमें दिव्य घोड़े जुते हुए थे ॥ ९ १/२ ॥
धर्मराजश्च भीमश्च फाल्गुनश्च यमौ तथा ॥ १० ॥ पृथक् पृथक् च ते चैनं मानार्थाभ्यामयोजयन् ।