भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 2025

तत्पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवने अलग-अलग बभ्रुवाहनका सत्कार करके उसे बहुत धन दिया ॥ १० १/२ ॥ ततस्तृतीये दिवसे सत्यवत्यात्मजो मुनिः ॥ ११ ॥ युधिष्ठिरं समभेत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् । उसके तीसरे दिन सत्यवतीनन्दन प्रवचनकुशल महर्षि व्यास युधिष्ठिरके पास आकर बोले— ॥ ११ १/२ ॥ अद्यप्रभृति कौन्तेय यजस्व समयो हि ते । मुहूर्तो यज्ञियः प्राप्तश्चोदयन्तीह याजकाः ॥ १२ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! तुम आजसे यज्ञ आरम्भ कर दो। उसका समय आ गया है। यज्ञका शुभ मुहूर्त उपस्थित है और याजकगण तुम्हें बुला रहे हैं ॥ १२ ॥ अहीनो नाम राजेन्द्र क्रतुस्तेऽयं च कल्पताम् । बहुत्वात् काञ्चनाख्यस्य ख्यातो बहुसुवर्णकः ॥ १३ ॥ ‘राजेन्द्र! तुम्हारे इस यज्ञमें किसी बातकी कमी नहीं रहेगी। इसलिये यह किसी भी अंगसे हीन न होनेके कारण अहीन (सर्वांगपूर्ण) कहलायेगा। इसमें सुवर्ण नामक द्रव्यकी अधिकता होगी; इसलिये यह बहुसुवर्णक नामसे विख्यात होगा ॥ १३ ॥ एवमत्र महाराज दक्षिणां त्रिगुणां कुरु । त्रित्वं व्रजतु ते राजन् ब्राह्मणा ह्यत्र कारणम् ॥ १४ ॥ ‘महाराज! यज्ञके प्रधान कारण ब्राह्मण ही हैं; इसलिये तुम उन्हें तिगुनी दक्षिणा देना। ऐसा करनेसे तुम्हारा यह एक ही यज्ञ तीन यज्ञोंके समान हो जायगा ॥ १४ ॥ त्रीनश्वमेधानत्र त्वं सम्प्राप्य बहुदक्षिणाम् । ज्ञातिवध्याकृतं पापं प्रहास्यसि नराधिप ॥ १५ ॥ ‘नरेश्वर! यहाँ बहुत-सी दक्षिणावाले तीन अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाकर तुम ज्ञातिवधके पापसे मुक्त हो जाओगे ॥ १५ ॥ पवित्रं परमं चैतत् पावनं चैतदुत्तमम् । यदाश्वमेधावभृथं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ॥ १६ ॥ ‘कुरुनन्दन! तुम्हें जो अश्वमेध-यज्ञका अवभृथ-स्नान प्राप्त होगा, वह परम पवित्र, पावन और उत्तम है’ ॥ १६ ॥ इत्युक्तः स तु तेजस्वी व्यासेनामितबुद्धिना । दीक्षां विवेश धर्मात्मा वाजिमेधाप्तये ततः ॥ १७ ॥ परम बुद्धिमान् व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा एवं तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धिके लिये उसी दिन दीक्षा ग्रहण की ॥ १७ ॥ ततो यज्ञं महाबाहुर्वाजिमेधं महाक्रतुम् । बह्वन्नदक्षिणं राजा सर्वकामगुणान्वितम् ॥ १८ ॥