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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

तत्पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवने अलग-अलग बभ्रुवाहनका सत्कार करके उसे बहुत धन दिया ॥ १० १/२ ॥ ततस्तृतीये दिवसे सत्यवत्यात्मजो मुनिः ॥ ११ ॥ युधिष्ठिरं समभेत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् । उसके तीसरे दिन सत्यवतीनन्दन प्रवचनकुशल महर्षि व्यास युधिष्ठिरके पास आकर बोले— ॥ ११ १/२ ॥ अद्यप्रभृति कौन्तेय यजस्व समयो हि ते । मुहूर्तो यज्ञियः प्राप्तश्चोदयन्तीह याजकाः ॥ १२ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! तुम आजसे यज्ञ आरम्भ कर दो। उसका समय आ गया है। यज्ञका शुभ मुहूर्त उपस्थित है और याजकगण तुम्हें बुला रहे हैं ॥ १२ ॥ अहीनो नाम राजेन्द्र क्रतुस्तेऽयं च कल्पताम् । बहुत्वात् काञ्चनाख्यस्य ख्यातो बहुसुवर्णकः ॥ १३ ॥ ‘राजेन्द्र! तुम्हारे इस यज्ञमें किसी बातकी कमी नहीं रहेगी। इसलिये यह किसी भी अंगसे हीन न होनेके कारण अहीन (सर्वांगपूर्ण) कहलायेगा। इसमें सुवर्ण नामक द्रव्यकी अधिकता होगी; इसलिये यह बहुसुवर्णक नामसे विख्यात होगा ॥ १३ ॥ एवमत्र महाराज दक्षिणां त्रिगुणां कुरु । त्रित्वं व्रजतु ते राजन् ब्राह्मणा ह्यत्र कारणम् ॥ १४ ॥ ‘महाराज! यज्ञके प्रधान कारण ब्राह्मण ही हैं; इसलिये तुम उन्हें तिगुनी दक्षिणा देना। ऐसा करनेसे तुम्हारा यह एक ही यज्ञ तीन यज्ञोंके समान हो जायगा ॥ १४ ॥ त्रीनश्वमेधानत्र त्वं सम्प्राप्य बहुदक्षिणाम् । ज्ञातिवध्याकृतं पापं प्रहास्यसि नराधिप ॥ १५ ॥ ‘नरेश्वर! यहाँ बहुत-सी दक्षिणावाले तीन अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाकर तुम ज्ञातिवधके पापसे मुक्त हो जाओगे ॥ १५ ॥ पवित्रं परमं चैतत् पावनं चैतदुत्तमम् । यदाश्वमेधावभृथं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ॥ १६ ॥ ‘कुरुनन्दन! तुम्हें जो अश्वमेध-यज्ञका अवभृथ-स्नान प्राप्त होगा, वह परम पवित्र, पावन और उत्तम है’ ॥ १६ ॥ इत्युक्तः स तु तेजस्वी व्यासेनामितबुद्धिना । दीक्षां विवेश धर्मात्मा वाजिमेधाप्तये ततः ॥ १७ ॥ परम बुद्धिमान् व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा एवं तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धिके लिये उसी दिन दीक्षा ग्रहण की ॥ १७ ॥ ततो यज्ञं महाबाहुर्वाजिमेधं महाक्रतुम् । बह्वन्नदक्षिणं राजा सर्वकामगुणान्वितम् ॥ १८ ॥

फिर उन महाबाहु नरेशने बहुत-से अन्नकी दक्षिणासे युक्त तथा सम्पूर्ण कामना और गुणोंसे सम्पन्न उस अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया ।। १८ ।।

तत्र वेदविदो राजंश्चक्रुः कर्माणि याजकाः । परिक्रमन्तः सर्वज्ञा विधिवत् साधुशिक्षितम् ।। १९ ।। उसमें वेदोंके ज्ञाता और सर्वज्ञ याजकोंने सम्पूर्ण कर्म किये-कराये। वे सब ओर घूम-घूमकर सत्पुरुषों-द्वारा शिक्षित कर्मका सम्पादन करते-कराते थे ।। १९ ।।

न तेषां स्खलितं किंचिदासीच्चाप्यकृतं तथा । क्रममुक्तं च युक्तं च चक्रुस्तत्र द्विजर्षभाः ।। २० ।। उनके द्वारा उस यज्ञमें कहीं भी कोई भूल या त्रुटि नहीं होने पायी। कोई भी कर्म न तो छूटा और न अधूरा रहा। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने प्रत्येक कार्यको क्रमके अनुसार उचित रीतिसे पूरा किया ।। २० ।।

कृत्वा प्रवर्ग्यं धर्माख्यं यथावद् द्विजसत्तमाः । चक्रुस्ते विधिवद् राजंस्तथैवाभिषवं द्विजाः ।। २१ ।। राजन्! वहाँ ब्राह्मणशिरोमणियोंने प्रवर्ग्य नामक धर्मानुकूल कर्मको यथोचित रीतिसे सम्पन्न करके विधिपूर्वक सोमाभिषव—सोमलताका रस निकालनेका कार्य किया ।। २१ ।।

अभिषूय ततो राजन् सोमं सोमपसत्तमाः । सवनान्यानुपूर्व्येण चक्रुः शास्त्रानुसारिणः ।। २२ ।। महाराज! सोमपान करनेवालोंमें श्रेष्ठ तथा शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले विद्वानोंने सोमरस निकालकर उसके द्वारा क्रमशः तीनों समयके सवन कर्म किये ।। २२ ।।

न तत्र कृपणः कश्चिन्न दरिद्रो बभूव ह । क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानवः ।। २३ ।। उस यज्ञमें आया हुआ कोई भी मनुष्य, चाहे वह निम्न-से-निम्न श्रेणीका क्यों न हो, दीन-दरिद्र, भूखा अथवा दुखिया नहीं रह गया था ।। २३ ।।

भोजनं भोजनार्थिभ्यो दापयामास शत्रुहा । भीमसेनो महातेजाः सततं राजशासनात् ।। २४ ।। शत्रुसूदन महातेजस्वी भीमसेन महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको भोजन दिलानेके कामपर सदा डटे रहते थे ।। २४ ।।

संस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकार्याणि याजकाः । दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रानुदर्शनात् ।। २५ ।। यज्ञकी वेदी बनानेमें निपुण याजकगण प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सब कार्य सम्पन्न किया करते थे ।। २५ ।।

नाषडङ्गविदत्रासीत् सदस्यस्तस्य धीमतः । नाव्रतो नानुपाध्यायो न च वादाविचक्षणः ।। २६ ।।

बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरके यज्ञका कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था जो छहों अंगोंका विद्वान्, ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाला, अध्यापनकर्ममें कुशल तथा वाद-विवादमें प्रवीण न हो ॥ २६ ॥ ततो यूपोच्छ्रये प्राप्ते षड् बैल्वान् भरतर्षभ । खादिरान् बिल्वसंमितांस्तावत्ः सर्ववर्णिनः ॥ २७ ॥ देवदारुमयी द्वौ तु यूपौ कुरुपतेर्मखे । श्लेष्मातकमयं चैकं याजकाः समकल्पयन् ॥ २८ ॥ भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जब यूपकी स्थापनाका समय आया, तब याजकोंने यज्ञभूमिमें बेलके छः, खैरके छः, पलाशके भी छः, देवदारुके दो और लसोड़ेका एक—इस प्रकार इक्कीस यूप कुरुराज युधिष्ठिरके यज्ञमें खड़े किये ॥ २७-२८ ॥ शोभार्थं चापरान् यूपान् काञ्चनान् भरतर्षभ । स भीमः कारयामास धर्मराजस्य शासनात् ॥ २९ ॥ भरतभूषण! इनके सिवा धर्मराजकी आज्ञासे भीमसेनने यज्ञकी शोभाके लिये और भी बहुत-से सुवर्णमय यूप खड़े कराये ॥ २९ ॥ ते व्यराजन्त राजर्षेर्वासोभिरुपशोभिताः । महेन्द्रानुगता देवा यथा सप्तर्षिभिर्दिवि ॥ ३० ॥ वस्त्रोंद्वारा अलंकृत किये गये वे राजर्षि युधिष्ठिरके यज्ञ सम्बन्धी यूप आकाशमें सप्तर्षियोंसे घिरे हुए इन्द्रके अनुगामी देवताओंके समान शोभा पाते थे ॥ ३० ॥ इष्टकाः काञ्चनीश्चात्र चयनार्थं कृताऽभवन् । शुशुभे चयनं तच्च दक्षस्येव प्रजापतेः ॥ ३१ ॥ यज्ञकी वेदी बनानेके लिये वहाँ सोनेकी ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उनके द्वारा जब वेदी बनकर तैयार हुई तब वह दक्षप्रजापतिकी यज्ञवेदीके समान शोभा पाने लगी ॥ ३१ ॥ चतुश्चित्यश्च तस्यासीदष्टादशकरात्मकः । स रुक्मपक्षो निचितस्त्रिकोणो गरुडाकृतिः ॥ ३२ ॥ उस यज्ञमण्डपमें अग्निचयनके लिये चार स्थान बने थे। उनमेंसे प्रत्येककी लम्बाई- चौड़ाई अठारह हाथकी थी। प्रत्येक वेदी सुवर्णमय पंखसे युक्त एवं गरुड़के समान आकारवाली थी। वह त्रिकोणाकार बनायी गयी थी ॥ ३२ ॥ ततो नियुक्ताः पशवो यथाशास्त्रं मनीषिभिः । तं तं देवं समुद्दिश्य पक्षिणः पशवश्च ये ॥ ३३ ॥ ऋषभाः शास्त्रपठितास्तथा जलचराश्च ये । सर्वांस्तानभ्ययुञ्जंस्ते तत्राग्निचयकर्मणि ॥ ३४ ॥ तदनन्तर मनीषी पुरुषोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पशुओंको नियुक्त किया। भिन्न- भिन्न देवताओंके उद्देश्यसे पशु-पक्षी, शास्त्रकथित वृषभ और जलचर जन्तु—इन सबका

अग्निस्थापन-कर्ममें याजकोंने उपयोग किया ॥ यूपेषु नियता चासीत् पशूनां त्रिशती तथा ।
अश्वरत्नोत्तरा यज्ञे कौन्तेयस्य महात्मनः ॥ ३५ ॥
कुन्तीनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके उस यज्ञमें जो यूप खड़े किये गये थे, उनमें तीन सौ पशु बाँधे गये थे। उन सबमें प्रधान वही अश्वरत्न था ॥ ३५ ॥
स यज्ञः शुशुभे तस्य साक्षाद् देवर्षिसंकुलः ।
गन्धर्वगणसंगीतः प्रनृत्तोऽप्सरसां गणैः ॥ ३६ ॥
साक्षात् देवर्षियोंसे भरा हुआ युधिष्ठिरका वह यज्ञ बड़ी शोभा पा रहा था। गन्धर्वोंके मधुर संगीत और अप्सराओंके नृत्यसे उसकी शोभा और बढ़ गयी थी ॥ ३६ ॥
स किंपुरुषसंकीर्णः किन्नरैश्चोपशोभितः ।
सिद्धविप्रनिवासैश्च समन्तादभिसंवृतः ॥ ३७ ॥
वह यज्ञमण्डप किम्पुरुषोंसे भरा-पूरा था। किन्नर भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके चारों ओर सिद्धों और ब्राह्मणोंके निवासस्थान बने थे, जिनसे वह यज्ञ-मण्डप घिरा था ॥ ३७ ॥
तस्मिन् सदसि नित्यास्तु व्यासशिष्या द्विजर्षभाः ।
सर्वशास्त्रप्रणेतारः कुशला यज्ञसंस्तरे ॥ ३८ ॥
व्यासजीके शिष्य श्रेष्ठ ब्राह्मण उस यज्ञसभामें सदा उपस्थित रहते थे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके प्रणेता और यज्ञकर्ममें कुशल थे ॥ ३८ ॥
नारदश्च बभूवात्र तुम्बुरुश्च महाद्युतिः ।
विश्वावसुश्चित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदाः ॥ ३९ ॥
गन्धर्वा गीतकुशला नृत्येषु च विशारदाः ।
रमयन्ति स्म तान् विप्रान् यज्ञकर्मान्तरेषु वै ॥ ४० ॥
नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा अन्य संगीतकलाकोविद, गाननिपुण एवं नृत्यविशारद गन्धर्व प्रतिदिन यज्ञकार्यके बीच-बीचमें समय मिलनेपर अपनी नाच-गानकी कलाओंद्वारा उन ब्राह्मणोंका मनोरंजन करते थे ॥ ३९-४० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे
अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका आरम्भविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2029)

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एकोननवतितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना

वैशम्पायन उवाच

श्रपयित्वा पशूनन्यान् विधिवद् द्विजसत्तमाः ।
तं तुरङ्गं यथाशास्त्रमालभन्त द्विजातयः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अन्यान्य पशुओंका विधिपूर्वक श्रपण करके उस अश्वका भी शास्त्रीय विधिके अनुसार आलभन किया ॥ १ ॥

ततः संश्रप्य तुरगं विधिवद् याजकास्तदा ।
उपसंवेशयन् राजंस्ततस्तां द्रुपदात्मजाम् ॥ २ ॥
कलाभिस्तिसृभी राजन् यथाविधि मनस्विनीम् ।
राजन्! तत्पश्चात् याजकोंने विधिपूर्वक अश्वका श्रपण करके उसके समीप मन्त्र, द्रव्य और श्रद्धा—इन तीन कलाओंसे युक्त मनस्विनी द्रौपदीको शास्त्रोक्त विधिके अनुसार बैठाया ॥ २ १/२ ॥

उद्धृत्य तु वपां तस्य यथाशास्त्रं द्विजातयः ॥ ३ ॥
श्रपयामासुरव्यग्रा विधिवद् भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद ब्राह्मणोंने शान्तचित्त होकर उस अश्वकी चर्बी निकाली और उसका विधिपूर्वक श्रपण करना आरम्भ किया ॥ ३ १/२ ॥

तं वपाधूमगन्धं तु धर्मराजः सहानुजैः ॥ ४ ॥
उपाजिघ्रद् यथाशास्त्रं सर्वपापापहं तदा ।
भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार उस चर्बीके धूमकी गन्ध सूँघी, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाली थी ॥ ४ १/२ ॥

शिष्टान्यङ्गानि यान्यासंस्तस्याश्वस्य नराधिप ॥ ५ ॥
तान्यग्नौ जुहुवुर्धीराः समस्ताः षोडशर्त्विजः ।
नरेश्वर! उस अश्वके जो शेष अंग थे, उनको धीर स्वभाववाले समस्त सोलह ऋत्विजोंने अग्निमें होम कर दिया ॥ ५ १/२ ॥

संस्थाप्यैवं तस्य राज्ञस्तं यज्ञं शक्रतेजसः ॥ ६ ॥
व्यासः सशिष्यो भगवान् वर्धयामास तं नृपम् ।
इस प्रकार इन्द्रके समान तेजस्वी राजा युधिष्ठिरके उस यज्ञको समाप्त करके शिष्योंसहित भगवान् व्यासने उन्हें बधाई दी—अभ्युदयसूचक आशीर्वाद दिया ॥ ६ १/२ ॥

ततो युधिष्ठिरः प्रादाद् ब्राह्मणेभ्ये यथाविधि ॥ ७ ॥
कोटीः सहस्रं निष्काणां व्यासाय तु वसुंधराम् ।
इसके बाद युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक एक हजार करोड़ (एक खर्व) स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणामें देकर व्यासजीको सम्पूर्ण पृथ्वी दान कर दी ॥ ७ १/२ ॥
प्रतिगृह्य धरां राजन् व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ ८ ॥
अब्रवीद् भरतश्रेष्ठं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
राजन्! सत्यवतीनन्दन व्यासने उस भूमिदानको ग्रहण करके भरतश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ८ १/२ ॥
वसुधा भवतस्त्वेषा संन्यस्ता राजसत्तम ॥ ९ ॥
निष्क्रयो दीयतां मह्यं ब्राह्मणा हि धनार्थिनः ।
‘नृपश्रेष्ठ! तुम्हारी दी हुई इस पृथ्वीको मैं पुनः तुम्हारे ही अधिकारमें छोड़ता हूँ। तुम मुझे इसका मूल्य दे दो; क्योंकि ब्राह्मण धनके ही इच्छुक होते हैं (राज्यके नहीं)’ ॥ ९ १/२ ॥
युधिष्ठिरस्तु तान् विप्रान् प्रत्युवाच महामनाः ॥ १० ॥
भ्रातृभिः सहितो धीमान् मध्ये राज्ञां महात्मनाम् ।
तब महामनस्वी नरेशोंके बीचमें भाइयोंसहित बुद्धिमान् महामना युधिष्ठिरने उन ब्राह्मणोंसे कहा— ॥ १० १/२ ॥
अश्वमेधे महायज्ञे पृथिवी दक्षिणा स्मृता ॥ ११ ॥
अर्जुनेन जिता चेयमृत्विग्भ्यः प्रापिता मया ।
वनं प्रवेक्ष्ये विप्राग्र्या विभजध्वं महीमिमाम् ॥ १२ ॥
चतुर्धा पृथिवीं कृत्वा चातुर्होत्रप्रमाणतः ।
नाहमादातुमिच्छामि ब्रह्मस्वं द्विजसत्तमाः ॥ १३ ॥
इदं नित्यं मनो विप्रा भ्रातॄणां चैव मे सदा ।
‘विप्रवरो! अश्वमेध नामक महायज्ञमें पृथ्वीकी दक्षिणा देनेका विधान है; अतः अर्जुनके द्वारा जीती हुई यह सारी पृथ्वी मैंने ऋत्विजोंको दे दी है। अब मैं वनमें चला जाऊँगा। आपलोग चातुर्होत्र यज्ञके प्रमाणानुसार पृथ्वीके चार भाग करके इसे आपसमें बाँट लें। द्विजश्रेष्ठगण! मैं ब्राह्मणोंका धन लेना नहीं चाहता। ब्राह्मणो! मेरे भाइयोंका भी सदा ऐसा ही विचार रहता है’ ॥ ११—१३ १/२ ॥
इत्युक्तवति तस्मिंस्तु भ्रातरो द्रौपदी च सा ॥ १४ ॥
एवमेतदिति प्राहुस्तदभूल्लोमहर्षणम् ।
उनके ऐसा कहनेपर भीमसेन आदि भाइयों और द्रौपदीने एक स्वरसे कहा—‘हाँ, महाराजका कहना ठीक है।’ इस महान् त्यागकी बात सुनकर सबके रोंगटे खड़े हो गये ॥ १४ १/२ ॥

ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् साधु साध्विति भारत ।। १५ ।।
तथैव द्विजसंघानां शंसतां विबभौ स्वनः ।
भारत! उस समय आकाशवाणी हुई—'पाण्डवो! तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। तुम्हें धन्यवाद!' इसी प्रकार पाण्डवोंके सत्साहसकी प्रशंसा करते हुए ब्राह्मण-समूहोंका भी शब्द वहाँ स्पष्ट सुनायी दे रहा था ।। १५ १/२ ।।

द्वैपायनस्तथा कृष्णः पुनरेव युधिष्ठिरम् ।। १६ ।।
प्रोवाच मध्ये विप्राणामिदं सम्पूजयन् मुनिः ।
तब मुनिवर द्वैपायनकृष्णने पुनः ब्राह्मणोंके बीचमें युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा— ।। १६ १/२ ।।

दत्तैषा भवता मह्यं तां ते प्रतिददाम्यहम् ।। १७ ।।
हिरण्यं दीयतामेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो धरास्तु ते ।
'राजन्! तुमने तो यह पृथ्वी मुझे दे ही दी। अब मैं अपनी ओरसे इसे वापस करता हूँ। तुम इन ब्राह्मणोंको सुवर्ण दे दो और पृथ्वी तुम्हारे ही अधिकारमें रह जाय' ।। १७ १/२ ।।

ततोऽब्रवीद् वासुदेवो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।। १८ ।।
यथाऽऽह भगवान् व्यासस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि ।
तब भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—'धर्मराज! भगवान् व्यास जैसा कहते हैं, वैसा ही तुम्हें करना चाहिये' ।। १८ १/२ ।।

इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठः प्रीतात्मा भ्रातृभिः सह ।। १९ ।।
कोटिकोटिकृतां प्रादाद् दक्षिणां त्रिगुणां क्रतोः ।
यह सुनकर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर भाइयोंसहित बहुत प्रसन्न हुए और प्रत्येक ब्राह्मणोंको उन्होंने यज्ञके लिये एक-एक करोड़की तिगुनी दक्षिणा दी ।। १९ १/२ ।।

न करिष्यति तल्लोके कश्चिदन्यो नराधिपः ।। २० ।।
यत् कृतं कुरुराजेन मरुत्तस्यानुकुर्वता ।
महाराज मरुत्तके मार्गका अनुसरण करनेवाले राजा युधिष्ठिरने उस समय जैसा महान् त्याग किया था, वैसा इस संसारमें दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा ।। २० १/२ ।।

प्रतिगृह्य तु तद् रत्नं कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।। २१ ।।
ऋत्विग्भ्यः प्रददौ विद्वांश्चतुर्धा व्यभजंश्च ते ।
विद्वान् महर्षि व्यासने वह सुवर्णराशि लेकर ब्राह्मणोंको दे दी और उन्होंने चार भाग करके उसे आपसमें बाँट लिया ।। २१ १/२ ।।

धरण्या निष्क्रयं दत्त्वा तद्धिरणयं युधिष्ठिरः ।। २२ ।।
धूतपापो जितस्वर्गो मुमुदे भ्रातृभिः सह ।

इस प्रकार पृथ्वीके मूल्यके रूपमें वह सुवर्ण देकर राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसहित बहुत प्रसन्न हुए। उनके सारे पाप धुल गये और उन्होंने स्वर्गपर अधिकार प्राप्त कर लिया ।। २२ १/२ ।।

ऋत्विजस्तमपर्यन्तं सुवर्णनिचयं तथा ।। २३ ।। व्यभजन्त द्विजातिभ्यो यथोत्साहं यथासुखम् । उस अनन्त सुवर्णराशिको पाकर ऋत्विजोंने बड़े उत्साह और आनन्दके साथ उसे ब्राह्मणोंको बाँट दिया ।। २३ १/२ ।।

यज्ञवाटे च यत् किंचिद् हिरण्यं सविभूषणम् ।। २४ ।। तोरणानि च यूपांश्च घटान् पात्रीस्तथैष्टकाः । युधिष्ठिराभ्यनुज्ञाताः सर्वं तद् व्यभजन् द्विजाः ।। २५ ।। यज्ञशालामें भी जो कुछ सुवर्ण या सोनेके आभूषण, तोरण, यूप, घड़े, बर्तन और ईंटें थीं, उन सबको भी युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर ब्राह्मणोंने आपसमें बाँट लिया ।। २४-२५ ।।

अनन्तरं द्विजातिभ्यः क्षत्रिया जह्निरे वसु । तथा विट्शूद्रसंघाश्च तथान्ये म्लेच्छजातयः ।। २६ ।। ब्राह्मणोंके लेनेके बाद जो धन वहाँ पड़ा रह गया, उसे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा म्लेच्छ जातिके लोग उठा ले गये ।। २३ ।।

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे मुदिता जग्मुरालयान् । तर्पिता वसुना तेन धर्मराजेन धीमता ।। २७ ।। तदनन्तर सब ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक अपने घरोंको गये। बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने उन सबको उस धनके द्वारा पूर्णतः तृप्त कर दिया था ।। २७ ।।

स्वमंशं भगवान् व्यासः कुन्त्यै साक्षाद्धि मानतः । प्रददौ तस्य महतो हिरण्यस्य महाद्युतिः ।। २८ ।। उस महान् सुवर्णराशिमेंसे महातेजस्वी भगवान् व्यासने जो अपना भाग प्राप्त किया था, उसे उन्होंने बड़े आदरके साथ कुन्तीको भेंट कर दिया ।। २८ ।।

श्वशुरात् प्रीतिदायं तं प्राप्य सा प्रीतमानसा । चकार पुण्यकं तेन सुमहत् संघशः पृथा ।। २९ ।। श्वशुरकी ओरसे प्रेमपूर्वक मिले हुए उस धनको पाकर कुन्तीदेवी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं और उसके द्वारा उन्होंने बड़े-बड़े सामूहिक पुण्य-कार्य किये ।। २९ ।।

गत्वा त्ववभृथं राजा विपाप्मा भ्रातृभिः सह । सभाज्यमानः शुशुभे महेन्द्रस्त्रिदशैरिव ।। ३० ।। यज्ञके अन्तमें अवभृथस्नान करके पापरहित हुए राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसे सम्मानित हो इस प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे देवताओंसे पूजित देवराज इन्द्र सुशोभित होते हैं ।। ३० ।।

पाण्डवाश्च महीपालैः समेतैरभिसंवृताः । अशोभन्त महाराज ग्रहास्तारागणैरिव ॥ ३१ ॥ महाराज! वहाँ आये हुए समस्त भूपालोंसे घिरे हुए पाण्डवलोग ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो तारोंसे घिरे हुए ग्रह सुशोभित हों ॥ ३१ ॥

राजभ्योऽपि ततः प्रादाद् रत्नानि विविधानि च । गजानश्वानलंकारान् स्त्रियो वासांसि काञ्चनम् ॥ ३२ ॥ तदनन्तर पाण्डवोंने यज्ञमें आये हुए राजाओंको भी तरह-तरहके रत्न, हाथी, घोड़े, आभूषण, स्त्रियाँ, वस्त्र और सुवर्ण भेंट किये ॥ ३२ ॥

तद् धनौघमपर्यन्तं पार्थः पार्थिवमण्डले । विसृजन् शुशुभे राजन् यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ३३ ॥ राजन्! उस अनन्त धनराशि को भूपालमण्डलमें बाँटते हुए कुन्तीकुमार युधिष्ठिर कुबेरके समान शोभा पाते थे ॥ ३३ ॥

आनीय च तथा वीरं राजानं बभ्रुवाहनम् । प्रदाय विपुलं वित्तं गृहान् प्रास्थापयत् तदा ॥ ३४ ॥ तत्पश्चात् वीर राजा बभ्रुवाहनको अपने पास बुलाकर राजाने उसे बहुत-सा धन देकर विदा किया ॥ ३४ ॥

दुःशलायाश्च तं पौत्रं बालकं भरतर्षभ । स्वराज्येऽथ पितुर्धीमान् स्वसुः प्रीत्या न्यवेशयत् ॥ ३५ ॥ भरतश्रेष्ठ! अपनी बहिन दुःशलाकी प्रसन्नताके लिये बुद्धिमान् युधिष्ठिरने उसके बालक पौत्रको पिताके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ३५ ॥

नृपतींश्चैव तान् सर्वान् सुविभक्तान् सुपूजितान् । प्रस्थापयामास वशी कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ३६ ॥ जितेन्द्रिय कुरुराज युधिष्ठिरने सब राजाओंको अच्छी तरह धन दिया और उनका विशेष सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया ॥ ३६ ॥

गोविन्दं च महात्मानं बलदेवं महाबलम् । तथान्यान् वृष्णिवीरांश्च प्रद्युम्नाद्यान् सहस्रशः ॥ ३७ ॥ पूजयित्वा महाराज यथाविधि महाद्युतिः । भ्रातृभिः सहितो राजा प्रास्थापयदरिंदमः ॥ ३८ ॥ महाराज! इसके बाद महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण, महाबली बलदेव तथा प्रद्युम्न आदि अन्यान्य सहस्रों वृष्णिवीरोंकी विधिवत् पूजा करके भाइयोंसहित शत्रुदमन महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरने उन सबको विदा किया ॥ ३७-३८ ॥

एवं बभूव यज्ञः स धर्मराजस्य धीमतः । बह्वन्नधनरत्नौघः सुरामैरेयसागरः ॥ ३९ ॥

सर्पिःपङ्का ह्रदा यत्र बभूवुश्चान्नपर्वताः ।
रसालाकर्दमा नद्यो बभूवुर्भरतर्षभ ॥ ४० ॥

इस प्रकार बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरका वह यज्ञ पूर्ण हुआ। उसमें अन्न, धन और रत्नोंके ढेर लगे हुए थे। देवताओंके मनमें अतिशय कामना उत्पन्न करनेवाली वस्तुओंका सागर लहराता था। कितने ही ऐसे तालाब थे, जिनमें घीकी कीचड़ जमी हुई थी और अन्नके तो पहाड़ ही खड़े थे। भरतभूषण! रससे भरी कीचड़रहित नदियाँ बहती थीं ॥ ३९-४० ॥

अध्याय (पृष्ठ 2035)

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महाराज युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञमें एक नेवलेका आगमन

भक्ष्यखाण्डवरागाणां क्रियतां भुज्यतां तथा । पशूनां बध्यतां चैव नान्तं ददृशिरे जनाः ॥ ४१ ॥ (पीपल और सोंठ मिलाकर जो मूँगका जूस तैयार किया जाता है, उसे 'खाण्डव' कहते हैं। उसीमें शक्कर मिला हुआ हो तो वह 'खाण्डवराग' कहा जाता है।) भक्ष्य-भोज्य पदार्थ और खाण्डवराग कितनी मात्रामें बनाये और खाये जाते हैं तथा कितने पशु वहाँ बाँधे हुए थे, इसकी कोई सीमा वहाँके लोगोंको नहीं दिखायी देती थी ॥ ४१ ॥

मत्तप्रमत्तमुदितं सुप्रीतयुवतीजनम् । मृदङ्गशङ्खनादैश्च मनोरममभूत् तदा ॥ ४२ ॥ उस यज्ञके भीतर आये हुए सब लोग मत्त-प्रमत्त और आनन्द विभोर हो रहे थे। युवतियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ विचरण करती थीं। मृदंगों और शंखोंकी ध्वनियोंसे उस यज्ञशालाकी मनोरमता और भी बढ़ गयी थी ॥ ४२ ॥

दीयतां भुज्यतां चेष्टं दिवारात्रमवारितम् । तं महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनाकुलम् ॥ ४३ ॥ कथयन्ति स्म पुरुषा नानादेशनिवासिनः । ‘जिसकी जैसी इच्छा हो, उसको वही वस्तु दी जाय। सबको इच्छानुसार भोजन कराया जाय’—यह घोषणा दिन-रात जारी रहती थी—कभी बंद नहीं होती थी। हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस यज्ञ-महोत्सवकी चर्चा नाना देशोंके निवासी मनुष्य बहुत दिनोंतक करते रहे ॥ ४३ १/२ ॥

वर्षित्वा धनधाराभिः कामै रत्नै रसैस्तथा । विपाप्मा भरतश्रेष्ठः कृतार्थः प्राविशत् पुरम् ॥ ४४ ॥ भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उस यज्ञमें धनकी मूसलाधार वर्षा की। सब प्रकारकी कामनाओं, रत्नों और रसोंकी भी वर्षा की। इस प्रकार पापरहित और कृतार्थ होकर उन्होंने अपने नगरमें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधसमाप्तौ एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधकी समाप्तिविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥

पितामहस्य मे यज्ञे धर्मराजस्य धीमतः ।

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नवतितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना

जनमेजय उवाच

पितामहस्य मे यज्ञे धर्मराजस्य धीमतः ।
यदाश्चर्यमभूत् किंचित् तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! मेरे प्रपितामह बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके यज्ञमें यदि कोई आश्चर्यजनक घटना हुई हो तो आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रूयतां राजशार्दूल महदाश्चर्यमुत्तमम् ।
अश्वमेधे महायज्ञे निवृत्ते यदभूत् प्रभो ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— नृपश्रेष्ठ! प्रभो! युधिष्ठिरका वह महान् अश्वमेध-यज्ञ जब पूरा हुआ, उसी समय एक बड़ी उत्तम किंतु महान् आश्चर्यमें डालनेवाली घटना घटित हुई, उसे बतलाता हूँ; सुनो ॥ २ ॥

तर्पितेषु द्विजाग्र्येषु ज्ञातिसम्बन्धिबन्धुषु ।
दीनान्धकृपणे वापि तदा भरतसत्तम ॥ ३ ॥
घुष्यमाणे महादाने दिक्षु सर्वासु भारत ।
पतत्सु पुष्पवर्षेषु धर्मराजस्य मूर्धनि ॥ ४ ॥
नीलाक्षस्तत्र नकुलो रुक्मपार्श्वस्तदानघ ।
वज्राशनिसमं नादममुञ्चद् वसुधाधिप ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! भारत! उस यज्ञमें श्रेष्ठ ब्राह्मणों, जातिवालों, सम्बन्धियों, बन्धु-बान्धवों, अन्धों तथा दीन-दरिद्रोंके तृप्त हो जानेपर जब युधिष्ठिरके महान् दानका चारों ओर शोर हो गया और धर्मराजके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा होने लगी उसी समय वहाँ एक नेवला आया। अनघ! उसकी आँखें नीली थीं और उसके शरीरके एक ओरका भाग सोनेका था। पृथ्वीनाथ! उसने आते ही एक बार वज्रके समान भयंकर गर्जना की ॥ ३—५ ॥

सकृदुत्सृज्य तन्नादं त्रासयानो मृगद्विजान् ।
मानुषं वचनं प्राह धृष्टो बिलशयो महान् ॥ ६ ॥
बिलनिवासी उस धृष्ट एवं महान् नेवलेने एक बार वैसी गर्जना करके समस्त मृगों और पक्षियोंको भयभीत कर दिया और फिर मनुष्यकी भाषामें कहा— ॥ ६ ॥

सक्तुप्रस्थेन वो नायं यज्ञस्तुल्यो नराधिपाः । उञ्छवृत्तेर्वदान्यस्य कुरुक्षेत्रनिवासिनः ॥ ७ ॥ ‘राजाओ! तुम्हारा यह यज्ञ कुरुक्षेत्रनिवासी एक उञ्छवृत्तिधारी उदार ब्राह्मणके सेरभर सत्तू दान करनेके बराबर भी नहीं हुआ है’ ॥ ७ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा नकुलस्य विशाम्पते । विस्मयं परमं जग्मुः सर्वे ते ब्राह्मणर्षभाः ॥ ८ ॥ प्रजानाथ! नेवलेकी वह बात सुनकर समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ८ ॥

ततः समेत्य नकुलं पर्यपृच्छन्त ते द्विजाः । कुतस्त्वं समनुप्राप्तो यज्ञं साधुसमागमम् ॥ ९ ॥ तब वे सब ब्राह्मण उस नेवलेके पास जाकर उसे चारों ओरसे घेरकर पूछने लगे—‘नकुल! इस यज्ञमें तो साधु पुरुषोंका ही समागम हुआ है, तुम कहाँसे आ गये?’ ॥ ९ ॥

किं बलं परमं तुभ्यं किं श्रुतं किं परायणम् । कथं भवन्तं विद्याम यो नो यज्ञं विगर्हसे ॥ १० ॥

'तुममें कौन-सा बल और कितना शास्त्रज्ञान है? तुम किसके सहारे रहते हो? हमें किस तरह तुम्हारा परिचय प्राप्त होगा? तुम कौन हो, जो हमारे इस यज्ञकी निन्दा करते हो? ।। १० ।।
अविलुप्यागमं कृत्स्नं विविधैर्यज्ञियैः कृतम् ।
यथागमं यथान्यायं कर्तव्यं च तथा कृतम् ।। ११ ।।
'हमने नाना प्रकारकी यज्ञ-सामग्री एकत्रित करके शास्त्रीय विधिकी अवहेलना न करते हुए इस यज्ञको पूर्ण किया है। इसमें शास्त्रसंगत और न्याययुक्त प्रत्येक कर्तव्य-कर्मका यथोचित पालन किया गया है ।। ११ ।।
पूजार्हाः पूजिताश्चात्र विधिवच्छास्त्रदर्शनात् ।
मन्त्राहूतिहुतश्चाग्निर्दत्तं देयममत्सरम् ।। १२ ।।
'इसमें शास्त्रीय दृष्टिसे पूजनीय पुरुषोंकी विधिवत् पूजा की गयी है। अग्निमें मन्त्र पढ़कर आहुति दी गयी है और देनेयोग्य वस्तुओंका ईर्ष्यारहित होकर दान किया गया है ।। १२ ।।
तुष्टा द्विजातयश्चात्र दानैर्बहुविधैरपि ।
क्षत्रियाश्च सुयुद्धेन श्राद्धैश्चापि पितामहाः ।। १३ ।।
पालनेन विशस्तुष्टाः कामैस्तुष्टा वरस्त्रियः ।
अनुक्रोशैस्तथा शूद्रा दानशेषैः पृथग्जनाः ।। १४ ।।
ज्ञातिसम्बन्धिनस्तुष्टाः शौचेन च नृपस्य नः ।
देवा हविर्भिः पुण्यैश्च रक्षणैः शरणागताः ।। १५ ।।
'यहाँ नाना प्रकारके दानोंसे ब्राह्मणोंको, उत्तम युद्धके द्वारा क्षत्रियोंको, श्राद्धके द्वारा पितामहोंको, रक्षाके द्वारा वैश्योंको, सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करके उत्तम स्त्रियोंको, दयासे शूद्रोंको, दानसे बची हुई वस्तुएँ देकर अन्य मनुष्योंको तथा राजाके शुद्ध बर्तावसे ज्ञाति एवं सम्बन्धियोंको संतुष्ट किया गया है। इसी प्रकार पवित्र हविष्यके द्वारा देवताओंको और रक्षाका भार लेकर शरणागतोंको प्रसन्न किया गया है ।। १३—१५ ।।
यदत्र तथ्यं तद् ब्रूहि सत्यं सत्यं द्विजातिषु ।
यथाश्रुतं यथादृष्टं पृष्टो ब्राह्मणकाम्यया ।। १६ ।।
श्रद्धेयवाक्यः प्राज्ञस्त्वं दिव्यं रूपं बिभर्षि च ।
समागतश्च विप्रैस्त्वं तद् भवान् वक्तुमर्हति ।। १७ ।।
'यह सब होनेपर भी तुमने क्या देखा या सुना है, जिससे इस यज्ञपर आक्षेप करते हो? इन ब्राह्मणोंके निकट इनके इच्छानुसार पूछे जानेपर तुम सच-सच बताओ; क्योंकि तुम्हारी बातें विश्वासके योग्य जान पड़ती हैं। तुम स्वयं भी बुद्धिमान् दिखायी देते और दिव्यरूप धारण किये हुए हो। इस समय तुम्हारा ब्राह्मणोंके साथ समागम हुआ है, इसलिये तुम्हें हमारे प्रश्नका उत्तर अवश्य देना चाहिये' ।। १६-१७ ।।

इति पृष्टो द्विजैस्तैः स प्रहसन् नकुलोऽब्रवीत् ।
नैषा मृषा मया वाणी प्रोक्ता दर्पेण वा द्विजाः ॥ १८ ॥

उन ब्राह्मणोंके इस प्रकार पूछनेपर नेवलेने हँसकर कहा—‘विप्रवृन्द! मैंने आपलोगोंसे मिथ्या अथवा घमंडमें आकर कोई बात नहीं कही है ॥ १८ ॥

यन्मयोक्तमिदं वाक्यं युष्माभिश्चाप्युपश्रुतम् ।
सक्तुप्रस्थेन वो नायं यज्ञस्तुल्यो द्विजर्षभाः ॥ १९ ॥

‘मैंने जो कहा है कि ‘द्विजवरो! आपलोगोंका यह यज्ञ उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणोंके द्वारा किये हुए सेरभर सत्तूदानके बराबर भी नहीं है' इसे आपने ठीक-ठीक सुना है ॥ १९ ॥

इत्यवश्यं मयैतद् वो वक्तव्यं द्विजसत्तमाः ।
शृणुताव्यग्रमनसः शंसतो मे यथातथम् ॥ २० ॥

‘श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसका कारण अवश्य आपलोगोंको बताने योग्य है। अब मैं यथार्थरूपसे जो कुछ कहता हूँ, उसे आप लोग शान्तचित्त होकर सुनें ॥ २० ॥

अनुभूतं च दृष्टं च यन्मयाद्भुतमुत्तमम् ।
उञ्छवृत्तेर्वदान्यस्य कुरुक्षेत्रनिवासिनः ॥ २१ ॥

‘कुरुक्षेत्रनिवासी उञ्छवृत्तिधारी दानी ब्राह्मणके सम्बन्धमें मैंने जो कुछ देखा और अनुभव किया है, वह बड़ा ही उत्तम एवं अद्भुत है' ॥ २१ ॥

स्वर्गं येन द्विजाः प्राप्तः सभार्यः ससुतस्नुषः ।
यथा चार्धं शरीरस्य ममेदं काञ्चनीकृतम् ॥ २२ ॥

‘ब्राह्मणो! उस दानके प्रभावसे पत्नी, पुत्र और पुत्रवधूसहित उन द्विजश्रेष्ठने जिस प्रकार स्वर्गलोकपर अधिकार पा लिया और वहाँ जिस तरह उन्होंने मेरा यह आधा शरीर सुवर्णमय कर दिया, वह प्रसंग बता रहा हूँ' ॥ २२ ॥

नकुल उवाच

हन्त वो वर्तयिष्यामि दानस्य फलमुत्तमम् ।
न्यायलब्धस्य सूक्ष्मस्य विप्रदत्तस्य यद् द्विजाः ॥ २३ ॥

नकुल बोला—ब्राह्मणो! कुरुक्षेत्रनिवासी द्विजके द्वारा दिये गये न्यायोपार्जित थोड़े-से अन्नके दानका जो उत्तम फल देखनेमें आया है, उसे मैं आपलोगोंको बतलाता हूँ ॥ २३ ॥

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे धर्मज्ञैर्बहुभिर्वृते ।
उञ्छवृत्तिर्द्विजः कश्चित् कापोतिरभवत् तदा ॥ २४ ॥

कुछ दिनों पहलेकी बात है, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रमें, जहाँ बहुत-से धर्मज्ञ महात्मा रहा करते हैं, कोई ब्राह्मण रहते थे। वे उञ्छवृत्तिसे अपना जीवन-निर्वाह करते थे। कबूतरके समान अन्नका दाना चुनकर लाते और उसीसे कुटुम्बका पालन करते थे ॥ २४ ॥

सभार्यः सह पुत्रेण सस्नुषस्तपसि स्थितः ।

बभूव शुक्लवृत्तः स धर्मात्मा नियतेन्द्रियः ॥ २५ ॥ वे अपनी स्त्री, पुत्र और पुत्रवधूके साथ रहकर तपस्यामें संलग्न थे। ब्राह्मणदेवता शुद्ध आचार-विचारसे रहनेवाले धर्मात्मा और जितेन्द्रिय थे ॥ २५ ॥ षष्ठे काले सदा विप्रो भुङ्क्ते तैः सह सुव्रतः । षष्ठे काले कदाचित् तु तस्याहारो न विद्यते ॥ २६ ॥ भुङ्क्तेऽन्यस्मिन् कदाचित् स षष्ठे काले द्विजोत्तमः । वे उत्तम व्रतधारी द्विज सदा छठे कालमें अर्थात् तीन-तीन दिनपर ही स्त्री-पुत्र आदिके साथ भोजन किया करते थे। यदि किसी दिन उस समय भोजन न मिला तो दूसरा छठा काल आनेपर ही वे द्विजश्रेष्ठ अन्न ग्रहण करते थे ॥ २६ १/२ ॥ कदाचिद् धर्मिणस्तस्य दुर्भिक्षे सति दारुणे ॥ २७ ॥ नाविद्यत तदा विप्राः संचयस्तन्निबोधत । क्षीणौषधिसमावेशे द्रव्यहीनोऽभवत् तदा ॥ २८ ॥ ब्राह्मणो! सुनो। एक समय वहाँ बड़ा भयंकर अकाल पड़ा। उन दिनों उन धर्मात्मा ब्राह्मणके पास अन्नका संग्रह तो था नहीं, खेतोंका अन्न भी सूख गया था। अतः वे सर्वथा निर्धन हो गये थे ॥ २७-२८ ॥ काले कालेऽस्य सम्प्राप्ते नैव विद्येत भोजनम् । क्षुधापरिगताः सर्वे प्रातिष्ठन्त तदा तु ते ॥ २९ ॥ उञ्छं तदा शुक्लपक्षे मध्यं तपति भास्करे । बारंबार छठा काल आता; किंतु उन्हें भोजन नहीं मिलता था। अतः वे सब-के-सब भूखे ही रह जाते थे। एक दिन ज्येष्ठके शुक्लपक्षमें दोपहरके समय उस परिवारके सब लोग उञ्छ लानेके लिये चले ॥ २९ १/२ ॥ उष्णार्तश्च क्षुधार्तश्च विप्रस्तपसि संस्थितः ॥ ३० ॥ उञ्छमप्राप्तवानेव ब्राह्मणः क्षुच्छ्रमान्वितः । स तथैव क्षुधाविष्टः सार्धं परिजनेन ह ॥ ३१ ॥ क्षपयामास तं कालं कृच्छ्रप्राणो द्विजोत्तमः । तपस्यामें लगे हुए वे ब्राह्मणदेवता गर्मी और भूख दोनोंसे कष्ट पा रहे थे। भूख और परिश्रमसे पीड़ित होनेपर भी वे उञ्छ न पा सके। उन्हें अन्नका एक दाना भी नहीं मिला; अतः परिवारके सभी लोगोंके साथ उसी तरह भूखसे पीड़ित रहकर ही उन्होंने वह समय काटा। वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बड़े कष्टसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे ॥ ३०-३१ १/२ ॥ अथ षष्ठे गते काले यवप्रस्थमुपार्जयन् ॥ ३२ ॥ यवप्रस्थं तु तं सक्तूनकुर्वन्त तपस्विनः । कृतजप्याह्निकास्ते तु हुत्वा चाग्निं यथाविधि ॥ ३३ ॥ कुडवं कुडवं सर्वे व्यभजन्त तपस्विनः ।

तदनन्तर एक दिन पुनः छठा काल आनेतक उन्होंने सेरभर जौका उपार्जन किया। उन तपस्वी ब्राह्मणोंने उस जौका सत्तू तैयार किया और जप तथा नैतिक नियम पूर्ण करके अग्निमें विधिपूर्वक आहुति देनेके पश्चात् वे सब लोग एक-एक कुडव अर्थात् एक-एक पाव सत्तू बाँटकर खानेके लिये उद्यत हुए॥ ३२-३३ १/२॥

अथागच्छद् द्विजः कश्चिदतिथिर्भुञ्जतां तदा ॥ ३४ ॥
ते तं दृष्ट्वातिथिं प्राप्तं प्रहृष्टमनसोऽभवन् ।
तेऽभिवाद्य सुखप्रश्नं पृष्ट्वा तमतिथिं तदा ॥ ३५ ॥
वे भोजनके लिये अभी बैठे ही थे कि कोई ब्राह्मण अतिथि उनके यहाँ आ पहुँचा। उस अतिथिको आया देख वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उस अतिथिको प्रणाम करके उन्होंने उससे कुशल-मंगल पूछा॥ ३४-३५॥

विशुद्धमनसो दान्ताः श्रद्धादमसमन्विताः ।
अनसूयवो विक्रोधाः साधवो वीतमत्सराः ॥ ३६ ॥
त्यक्तमानमदक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः ।
स ब्रह्मचर्यं गोत्रं ते तस्य ख्यात्वा परस्परम् ॥ ३७ ॥
कुटीं प्रवेशयामासुः क्षुधार्तमतिथिं तदा ।
ब्राह्मण-परिवारके सब लोग विशुद्धचित्त, जितेन्द्रिय, श्रद्धालु, मनको वशमें रखनेवाले, दोषदृष्टिसे रहित, क्रोधहीन, सज्जन, ईर्ष्यारहित और धर्मज्ञ थे। उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अभिमान, मद और क्रोधको सर्वथा त्याग दिया था। क्षुधासे कष्ट पाते हुए उस अतिथि ब्राह्मणको अपने ब्रह्मचर्य और गोत्रका परस्पर परिचय देते हुए वे कुटीमें ले गये॥ ३६-३७ १/२॥

इदमर्घ्यं च पाद्यं च बृसी चेयं तवानघ ॥ ३८ ॥
शुचयः सक्तवश्चेमे नियमोपार्जिताः प्रभो ।
प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते मया दत्ता द्विजर्षभ ॥ ३९ ॥
तत्पश्चात् वहाँ उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणने कहा—'भगवन्! अनघ! आपके लिये ये अर्घ्य, पाद्य और आसन मौजूद हैं तथा न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए ये परम पवित्र सत्तू आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। द्विजश्रेष्ठ! मैंने प्रसन्नतापूर्वक इन्हें आपको अर्पण किया है। आप स्वीकार करें'॥ ३८-३९॥

इत्युक्तः प्रतिगृह्याथ सक्तूनां कुडवं द्विजः ।
भक्षयामास राजेन्द्र न च तृप्तिं जगाम सः ॥ ४० ॥
राजेन्द्र! ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर अतिथिने एक पाव सत्तू लेकर खा लिया; परंतु उतनेसे वह तृप्त नहीं हुआ॥ ४०॥

स उञ्छवृत्तिस्तं प्रेक्ष्य क्षुधापरिगतं द्विजम् ।
आहारं चिन्तयामास कथं तृप्तो भवेदिति ॥ ४१ ॥

उस उञ्छवृत्तिवाले द्विजने देखा कि ब्राह्मण अतिथि तो अब भी भूखे ही रह गये हैं। तब वे उसके लिये आहारका चिन्तन करने लगे कि यह ब्राह्मण कैसे संतुष्ट हो? ॥ ४१ ॥

तस्य भार्याब्रवीद् वाक्यं मद्भागो दीयतामिति ।
गच्छत्वेष यथाकामं परितुष्टो द्विजोत्तमः ॥ ४२ ॥
तब ब्राह्मणकी पत्नीने कहा—'नाथ! यह मेरा भाग इन्हें दे दीजिये, जिससे ये ब्राह्मणदेवता इच्छानुसार तृप्तिलाभ करके यहाँसे पधारें' ॥ ४२ ॥

इति ब्रुवन्तीं तां साध्वीं भार्यां स द्विजसत्तमः ।
क्षुधापरिगतां ज्ञात्वा तान् सक्तून् नाभ्यनन्दत ॥ ४३ ॥
अपनी पतिव्रता पत्नीकी यह बात सुनकर उन द्विजश्रेष्ठने उसे भूखी जानकर उसके दिये हुए सत्तूको लेनेकी इच्छा नहीं की ॥ ४३ ॥

आत्मानुमानतो विद्वान् स तु विप्रर्षभस्तदा ।
जानन् वृद्धां क्षुधार्तां च श्रान्तां ग्लानां तपस्विनीम् ॥ ४४ ॥
त्वगस्थिभूतां वेपन्तीं ततो भार्यामुवाच ह ।
उन विद्वान् ब्राह्मणशिरोमणिने अपने ही अनुमानसे यह जान लिया कि यह मेरी वृद्धा स्त्री स्वयं भी क्षुधासे कष्ट पा रही है, थकी है और अत्यन्त दुर्बल हो गयी है। इस तपस्विनीके शरीरमें चमड़ेसे ढकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया है और यह काँप रही है। उसकी अवस्थापर दृष्टिपात करके उन्होंने पत्नीसे कहा— ॥ ४४ १/२ ॥

अपि कीटपतङ्गानां मृगाणां चैव शोभने ॥ ४५ ॥
स्त्रियो रक्ष्याश्च पोष्याश्च न त्वेवं वक्तुमर्हसि ।
'शोभने! अपनी स्त्रीकी रक्षा और पालन-पोषण करना कीट-पतंग और पशुओंका भी कर्तव्य है; अतः तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ४५ १/२ ॥

अनुकम्प्यो नरः पत्न्या पुष्टो रक्षित एव च ॥ ४६ ॥
'जो पुरुष होकर भी स्त्रीके द्वारा अपना पालन-पोषण और संरक्षण करता है, वह मनुष्य दयाका पात्र है ॥ ४६ ॥

प्रपतेद् यशसो दीप्तात् स च लोकान् न चाप्नुयात् ।
धर्मकामार्थकार्याणि शुश्रूषा कुलसंततिः ॥ ४७ ॥
दारेष्वधीनो धर्मश्च पितॄणामात्मनस्तथा ।
'वह उज्ज्वल कीर्तिसे भ्रष्ट हो जाता है और उसे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति नहीं होती। धर्म, काम और अर्थ-सम्बन्धी कार्य, सेवा-शुश्रूषा तथा वंशपरम्पराकी रक्षा—ये सब स्त्रीके ही अधीन हैं। पितरोंका तथा अपना धर्म भी पत्नीके ही आश्रित है ॥ ४७ १/२ ॥

न वेत्ति कर्मतो भार्यारक्षणे योऽक्षमः पुमान् ॥ ४८ ॥
अयशो महदाप्नोति नरकांश्चैव गच्छति ।

‘जो पुरुष स्त्रीकी रक्षा करना अपना कर्तव्य नहीं मानता अथवा जो स्त्रीकी रक्षा करनेमें असमर्थ है, वह संसारमें महान् अपयशका भागी होता है और परलोकमें जानेपर उसे नरकोंमें गिरना पड़ता है’ ॥ ४८ १/२ ॥

इत्युक्ता सा ततः प्राह धर्मार्थौ नौ समौ द्विज ॥ ४९ ॥
सक्तुप्रस्थचतुर्भागं गृहाणेमं प्रसीद मे ।
पतिके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणी बोली—‘ब्रह्मन्! हम दोनोंके धर्म और अर्थ समान हैं, अतः आप मुझपर प्रसन्न हों और मेरे हिस्सेका यह पावभर सत्तू ले लें (और लेकर इसे अतिथिको दे दें) ॥ ४९ १/२ ॥

सत्यं रतिश्च धर्मश्च स्वर्गश्च गुणनर्जितः ॥ ५० ॥
स्त्रीणां पतिसमाधीनं कांक्षितं च द्विजर्षभ ।
‘द्विजश्रेष्ठ! स्त्रियोंका सत्य, धर्म, रति, अपने गुणोंसे मिला हुआ स्वर्ग तथा उनकी सारी अभिलाषा पतिके ही अधीन है ॥ ५० १/२ ॥

ऋतुर्मातुः पितुर्बीजं दैवतं परमं पतिः ॥ ५१ ॥
भर्तुः प्रसादान्नारीणां रतिपुत्रफलं तथा ।
‘माताका रज और पिताका वीर्य—इन दोनोंके मिलनेसे ही वंशपरम्परा चलती है। स्त्रीके लिये पति ही सबसे बड़ा देवता है। नारियोंको जो रति और पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है, वह पतिका ही प्रसाद है ॥ ५१ १/२ ॥

पालनाद्धि पतिस्त्वं मे भर्तासि भरणाच्च मे ॥ ५२ ॥
पुत्रप्रदानाद् वरदस्तस्मात् सक्तून् प्रयच्छ मे ।
आप पालन करनेके कारण मेरे पति, भरण-पोषण करनेसे भर्ता और पुत्र प्रदान करनेके कारण वरदाता हैं, इसलिये मेरे हिस्सेका सत्तू अतिथिदेवताको अर्पण कीजिये ॥ ५२ १/२ ॥

जरापरिगतो वृद्धः क्षुधार्तो दुर्बलो भृशम् ॥ ५३ ॥
उपवासपरिश्रान्तो यदा त्वमपि कर्शितः ।
‘आप भी तो जराजीर्ण, वृद्ध, क्षुधातुर, अत्यन्त दुर्बल, उपवाससे थके हुए और क्षीणकाय हो रहे हैं। (फिर आप जिस तरह भूखका कष्ट सहन करते हैं, उसी प्रकार मैं भी सह लूँगी)’ ॥ ५३ १/२ ॥

इत्युक्तः स तया सक्तून् प्रगृह्येदं वचोऽब्रवीत् ॥ ५४ ॥
द्विज सक्तूनिमान् भूयः प्रतिगृह्णीष्व सत्तम ।
पत्नीके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणने सत्तू लेकर अतिथिसे कहा—‘साधुपुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! आप यह सत्तू भी पुनः ग्रहण कीजिये’ ॥ ५४ १/२ ॥

स तान् प्रगृह्य भुक्त्वा च न तुष्टिमगमद् द्विजः ।