भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2042, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2042

तदनन्तर एक दिन पुनः छठा काल आनेतक उन्होंने सेरभर जौका उपार्जन किया। उन तपस्वी ब्राह्मणोंने उस जौका सत्तू तैयार किया और जप तथा नैतिक नियम पूर्ण करके अग्निमें विधिपूर्वक आहुति देनेके पश्चात् वे सब लोग एक-एक कुडव अर्थात् एक-एक पाव सत्तू बाँटकर खानेके लिये उद्यत हुए॥ ३२-३३ १/२॥

अथागच्छद् द्विजः कश्चिदतिथिर्भुञ्जतां तदा ॥ ३४ ॥
ते तं दृष्ट्वातिथिं प्राप्तं प्रहृष्टमनसोऽभवन् ।
तेऽभिवाद्य सुखप्रश्नं पृष्ट्वा तमतिथिं तदा ॥ ३५ ॥
वे भोजनके लिये अभी बैठे ही थे कि कोई ब्राह्मण अतिथि उनके यहाँ आ पहुँचा। उस अतिथिको आया देख वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उस अतिथिको प्रणाम करके उन्होंने उससे कुशल-मंगल पूछा॥ ३४-३५॥

विशुद्धमनसो दान्ताः श्रद्धादमसमन्विताः ।
अनसूयवो विक्रोधाः साधवो वीतमत्सराः ॥ ३६ ॥
त्यक्तमानमदक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः ।
स ब्रह्मचर्यं गोत्रं ते तस्य ख्यात्वा परस्परम् ॥ ३७ ॥
कुटीं प्रवेशयामासुः क्षुधार्तमतिथिं तदा ।
ब्राह्मण-परिवारके सब लोग विशुद्धचित्त, जितेन्द्रिय, श्रद्धालु, मनको वशमें रखनेवाले, दोषदृष्टिसे रहित, क्रोधहीन, सज्जन, ईर्ष्यारहित और धर्मज्ञ थे। उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अभिमान, मद और क्रोधको सर्वथा त्याग दिया था। क्षुधासे कष्ट पाते हुए उस अतिथि ब्राह्मणको अपने ब्रह्मचर्य और गोत्रका परस्पर परिचय देते हुए वे कुटीमें ले गये॥ ३६-३७ १/२॥

इदमर्घ्यं च पाद्यं च बृसी चेयं तवानघ ॥ ३८ ॥
शुचयः सक्तवश्चेमे नियमोपार्जिताः प्रभो ।
प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते मया दत्ता द्विजर्षभ ॥ ३९ ॥
तत्पश्चात् वहाँ उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणने कहा—'भगवन्! अनघ! आपके लिये ये अर्घ्य, पाद्य और आसन मौजूद हैं तथा न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए ये परम पवित्र सत्तू आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। द्विजश्रेष्ठ! मैंने प्रसन्नतापूर्वक इन्हें आपको अर्पण किया है। आप स्वीकार करें'॥ ३८-३९॥

इत्युक्तः प्रतिगृह्याथ सक्तूनां कुडवं द्विजः ।
भक्षयामास राजेन्द्र न च तृप्तिं जगाम सः ॥ ४० ॥
राजेन्द्र! ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर अतिथिने एक पाव सत्तू लेकर खा लिया; परंतु उतनेसे वह तृप्त नहीं हुआ॥ ४०॥

स उञ्छवृत्तिस्तं प्रेक्ष्य क्षुधापरिगतं द्विजम् ।
आहारं चिन्तयामास कथं तृप्तो भवेदिति ॥ ४१ ॥