भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2041, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2041

बभूव शुक्लवृत्तः स धर्मात्मा नियतेन्द्रियः ॥ २५ ॥ वे अपनी स्त्री, पुत्र और पुत्रवधूके साथ रहकर तपस्यामें संलग्न थे। ब्राह्मणदेवता शुद्ध आचार-विचारसे रहनेवाले धर्मात्मा और जितेन्द्रिय थे ॥ २५ ॥ षष्ठे काले सदा विप्रो भुङ्क्ते तैः सह सुव्रतः । षष्ठे काले कदाचित् तु तस्याहारो न विद्यते ॥ २६ ॥ भुङ्क्तेऽन्यस्मिन् कदाचित् स षष्ठे काले द्विजोत्तमः । वे उत्तम व्रतधारी द्विज सदा छठे कालमें अर्थात् तीन-तीन दिनपर ही स्त्री-पुत्र आदिके साथ भोजन किया करते थे। यदि किसी दिन उस समय भोजन न मिला तो दूसरा छठा काल आनेपर ही वे द्विजश्रेष्ठ अन्न ग्रहण करते थे ॥ २६ १/२ ॥ कदाचिद् धर्मिणस्तस्य दुर्भिक्षे सति दारुणे ॥ २७ ॥ नाविद्यत तदा विप्राः संचयस्तन्निबोधत । क्षीणौषधिसमावेशे द्रव्यहीनोऽभवत् तदा ॥ २८ ॥ ब्राह्मणो! सुनो। एक समय वहाँ बड़ा भयंकर अकाल पड़ा। उन दिनों उन धर्मात्मा ब्राह्मणके पास अन्नका संग्रह तो था नहीं, खेतोंका अन्न भी सूख गया था। अतः वे सर्वथा निर्धन हो गये थे ॥ २७-२८ ॥ काले कालेऽस्य सम्प्राप्ते नैव विद्येत भोजनम् । क्षुधापरिगताः सर्वे प्रातिष्ठन्त तदा तु ते ॥ २९ ॥ उञ्छं तदा शुक्लपक्षे मध्यं तपति भास्करे । बारंबार छठा काल आता; किंतु उन्हें भोजन नहीं मिलता था। अतः वे सब-के-सब भूखे ही रह जाते थे। एक दिन ज्येष्ठके शुक्लपक्षमें दोपहरके समय उस परिवारके सब लोग उञ्छ लानेके लिये चले ॥ २९ १/२ ॥ उष्णार्तश्च क्षुधार्तश्च विप्रस्तपसि संस्थितः ॥ ३० ॥ उञ्छमप्राप्तवानेव ब्राह्मणः क्षुच्छ्रमान्वितः । स तथैव क्षुधाविष्टः सार्धं परिजनेन ह ॥ ३१ ॥ क्षपयामास तं कालं कृच्छ्रप्राणो द्विजोत्तमः । तपस्यामें लगे हुए वे ब्राह्मणदेवता गर्मी और भूख दोनोंसे कष्ट पा रहे थे। भूख और परिश्रमसे पीड़ित होनेपर भी वे उञ्छ न पा सके। उन्हें अन्नका एक दाना भी नहीं मिला; अतः परिवारके सभी लोगोंके साथ उसी तरह भूखसे पीड़ित रहकर ही उन्होंने वह समय काटा। वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बड़े कष्टसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे ॥ ३०-३१ १/२ ॥ अथ षष्ठे गते काले यवप्रस्थमुपार्जयन् ॥ ३२ ॥ यवप्रस्थं तु तं सक्तूनकुर्वन्त तपस्विनः । कृतजप्याह्निकास्ते तु हुत्वा चाग्निं यथाविधि ॥ ३३ ॥ कुडवं कुडवं सर्वे व्यभजन्त तपस्विनः ।