महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तमुञ्छवृत्तिरालक्ष्य ततश्चिन्तापरोऽभवत् ।। ५५ ।।
अतिथि ब्राह्मण उस सत्तूको भी लेकर खा गया; किंतु संतुष्ट नहीं हुआ। यह देखकर उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणको बड़ी चिन्ता हुई ।। ५५ ।।
पुत्र उवाच
सक्तूनिमान् प्रगृह्य त्वं देहि विप्राय सत्तम ।
इत्येव सुकृतं मन्ये तस्मादेतत् करोम्यहम् ।। ५६ ।।
**तब उनके पुत्रने कहा—**सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पिताजी! आप मेरे हिस्सेका यह सत्तू लेकर ब्राह्मणको दे दीजिये। मैं इसीमें पुण्य मानता हूँ, इसलिये ऐसा कर रहा हूँ ।। ५६ ।।
भवान् हि परिपाल्यो मे सर्वदैव प्रयत्नतः ।
साधूनां काङ्क्षितं यस्मात् पितुर्वृद्धस्य पालनम् ।। ५७ ।।
मुझे सदा यत्नपूर्वक आपका पालन करना चाहिये; क्योंकि साधु पुरुष सदा इस बातकी अभिलाषा रखते हैं कि मैं अपने बूढ़े पिताका पालन-पोषण करूँ ।। ५७ ।।
पुत्रार्थो विहितो ह्येष वार्धके परिपालनम् ।
श्रुतिरेषा हि विप्रर्षे त्रिषु लोकेषु शाश्वती ।। ५८ ।।
पुत्र होनेका यही फल है कि वह वृद्धावस्थामें पिताकी रक्षा करे। ब्रह्मर्षे! तीनों लोकोंमें यह सनातन श्रुति प्रसिद्ध है ॥ ५८ ॥
प्राणधारणमात्रेण शक्यं कर्तुं तपस्त्वया ।
प्राणो हि परमो धर्मः स्थितो देहेषु देहिनाम् ॥ ५९ ॥
प्राणधारणमात्रसे आप तप कर सकते हैं। देहधारियोंके शरीरोंमें स्थित हुआ प्राण ही परम धर्म है ॥ ५९ ॥
पितोवाच
अपि वर्षसहस्री त्वं बाल एव मतो मम ।
उत्पाद्य पुत्रं हि पिता कृतकृत्यो भवेत् सुतात् ॥ ६० ॥
पिताने कहा— बेटा! तुम हजार वर्षके हो जाओ तो भी हमारे लिये बालक ही हो। पिता पुत्रको जन्म देकर ही उससे अपनेको कृतकृत्य मानता है ॥ ६० ॥
बालानां क्षुद् बलवती जानाम्येतदहं प्रभो ।
वृद्धोऽहं धारयिष्यामि त्वं बली भव पुत्रक ॥ ६१ ॥
सामर्थ्यशाली पुत्र! मैं इस बातको अच्छी तरह जानता हूँ कि बच्चोंकी भूख बड़ी प्रबल होती है। मैं तो बूढ़ा हूँ। भूखे रहकर भी प्राण धारण कर सकता हूँ। तुम यह सत्तू खाकर बलवान् होओ—अपने प्राणोंकी रक्षा करो ॥ ६१ ॥
जीर्णेन वयसा पुत्र न मां क्षुद् बाधतेऽपि च ।
दीर्घकालं तपस्तप्तं न मे मरणतो भयम् ॥ ६२ ॥
बेटा! जीर्ण अवस्था हो जानेके कारण मुझे भूख अधिक कष्ट नहीं देती है। इसके सिवा मैं दीर्घकालतक तपस्या कर चुका हूँ; इसलिये अब मुझे मरनेका भय नहीं है ॥ ६२ ॥
पुत्र उवाच
अपत्यमस्मि ते पुंसस्त्राणात् पुत्र इति स्मृतः ।
आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात् त्राह्यात्मानमिहात्मना ॥ ६३ ॥
पुत्र बोला— तात! मैं आपका पुत्र हूँ, पुरुषका त्राण करनेके कारण ही संतानको पुत्र कहा गया है। इसके सिवा पुत्र पिताका अपना ही आत्मा माना गया है; अतः आप अपने आत्मभूत पुत्रके द्वारा अपनी रक्षा कीजिये ॥ ६३ ॥
पितोवाच
रूपेण सदृशस्त्वं मे शीलेन च दमेन च ।
परीक्षितश्च बहुधा सक्तूनादत्स्व ते सुत ॥ ६४ ॥
पिताने कहा— बेटा! तुम रूप, शील (सदाचार और सद्भाव) तथा इन्द्रियसंयमके द्वारा मेरे ही समान हो। तुम्हारे इन गुणोंकी मैंने अनेक बार परीक्षा कर ली है, अतः मैं
तुम्हारा सत्तू लेता हूँ ॥ ६४ ॥ इत्युक्त्वाऽऽदाय तान् सक्तून् प्रीतात्मा द्विजसत्तमः । प्रहसन्निव विप्राय स तस्मै प्रददौ तदा ॥ ६५ ॥ यों कहकर श्रेष्ठ ब्राह्मणने प्रसन्नतापूर्वक वह सत्तू ले लिया और हँसते हुए-से उस ब्राह्मण अतिथिको परोस दिया ॥ ६५ ॥ भुक्त्वा तानपि सक्तून् स नैव तृप्तो बभूव ह । उञ्छवृत्तिस्तु धर्मात्मा व्रीडामनुजगाम ह ॥ ६६ ॥ वह सत्तू खाकर भी ब्राह्मण देवताका पेट न भरा। यह देखकर उञ्छवृत्तिधारी धर्मात्मा ब्राह्मण बड़े संकोचमें पड़ गये ॥ ६६ ॥ तं वै वधूः स्थिता साध्वी ब्राह्मणप्रियकाम्यया । सक्तूनादाय संहृष्टा श्वशुरं वाक्यमब्रवीत् ॥ ६७ ॥ उनकी पुत्रवधू भी बड़ी सुशीला थी। वह ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे उनके पास जा बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने उन श्वशुरदेवसे बोली— ॥ ६७ ॥ संतानात् तव संतानं मम विप्र भविष्यति । सक्तूनिमानतिथये गृहीत्वा संप्रयच्छ मे ॥ ६८ ॥ 'विप्रवर! आपकी संतानसे मुझे संतान प्राप्त होगी; अतः आप मेरे परम पूज्य हैं। मेरे हिस्सेका यह सत्तू लेकर आप अतिथि देवताको अर्पित कीजिये ॥ ६८ ॥ तव प्रसादान्निर्वृत्ता मम लोकाः किलाक्षयाः । पुत्रेण तानवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ॥ ६९ ॥ 'आपकी कृपासे मुझे अक्षय लोक प्राप्त हो गये। पुत्रके द्वारा मनुष्य उन लोकोंमें जाते हैं, जहाँ जाकर वह कभी शोकमें नहीं पड़ता ॥ ६९ ॥ धर्माद्या हि यथा त्रेता वह्नित्रेता तथैव च । तथैव पुत्रपौत्राणां स्वर्गस्त्रेता किलाक्षयः ॥ ७० ॥ 'जैसे धर्म तथा उससे संयुक्त अर्थ और काम—ये तीनों स्वर्गके प्राप्ति करानेवाले हैं तथा जैसे आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि—ये तीनों स्वर्गके साधन हैं, उसी प्रकार पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र—ये त्रिविध संतानें अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली हैं ॥ ७० ॥ पितॄन् ऋणात् तारयति पुत्र इत्यनुशुश्रुम । पुत्रपौत्रैश्च नियतं साधुलोकानुपाश्नुते ॥ ७१ ॥ 'हमने सुना है कि पुत्र पिताको पितृ-ऋणसे छुटकारा दिला देता है। पुत्रों और पौत्रोंके द्वारा मनुष्य निश्चय ही श्रेष्ठ लोकोंमें जाते हैं' ॥ ७१ ॥
श्वशुर उवाच वातातपविशीर्णाङ्गीं त्वां विवर्णां निरीक्ष्य वै ।
कर्शितों सुव्रताचारे क्षुधाविह्वलचेतसम् ॥ ७२ ॥
कथं सक्तून् ग्रहीष्यामि भूत्वा धर्मोपघातकः ।
कल्याणवृत्ते कल्याणि नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ७३ ॥
**श्वशुरने कहा—**बेटी! हवा और धूपके मारे तुम्हारा सारा शरीर सूख रहा है—शिथिल होता जा रहा है। तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है। उत्तम व्रत और आचारका पालन करनेवाली पुत्री! तुम बहुत दुर्बल हो गयी हो। क्षुधाके कष्टसे तुम्हारा चित्त अत्यन्त व्याकुल है। तुम्हें ऐसी अवस्थामें देखकर भी तुम्हारे हिस्सेका सत्तू कैसे ले लूँ। ऐसा करनेसे तो मैं धर्मकी हानि करनेवाला हो जाऊँगा। अतः कल्याणमय आचरण करनेवाली कल्याणि! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ७२-७३ ॥
षष्ठे काले व्रतवतीं शौचशीलतपोऽन्विताम् ।
कृच्छ्रवृत्तिं निराहारां द्रक्ष्यामि त्वां कथं शुभे ॥ ७४ ॥
तुम प्रतिदिन शौच, सदाचार और तपस्यामें संलग्न रहकर छठे कालमें भोजन करनेका व्रत लिये हुए हो। शुभे! बड़ी कठिनाईसे तुम्हारी जीविका चलती है। आज सत्तू लेकर तुम्हें निराहार कैसे देख सकूँगा ॥ ७४ ॥
बाला क्षुधार्ता नारी च रक्ष्या त्वं सततं मया ।
उपवासपरिश्रान्ता त्वं हि बान्धवनन्दिनी ॥ ७५ ॥
एक तो तुम अभी बालिका हो, दूसरे भूखसे पीड़ित हो रही हो, तीसरे नारी हो और चौथे उपवास करते-करते अत्यन्त दुबली हो गयी हो; अतः मुझे सदा तुम्हारी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि तुम अपनी सेवाओंद्वारा बान्धवजनोंको आनन्दित करनेवाली हो ॥ ७५ ॥
स्नुषोवाच
गुरोर्मम गुरुस्त्वं वै यतो दैवतदैवतम् ।
देवातिदेवस्तस्मात् त्वं सक्तूनादत्स्व मे प्रभो ॥ ७६ ॥
**पुत्रवधू बोली—**भगवन्! आप मेरे गुरुके भी गुरु, देवताओंके भी देवता और सामान्य देवताकी अपेक्षा भी अतिशय उत्कृष्ट देवता हैं, अतः मेरा दिया हुआ यह सत्तू स्वीकार कीजिये ॥ ७६ ॥
देहः प्राणश्च धर्मश्च शुश्रूषार्थमिदं गुरोः ।
तव विप्र प्रसादेन लोकान् प्राप्स्यामहे शुभान् ॥ ७७ ॥
मेरा यह शरीर, प्राण और धर्म—सब कुछ बड़ोंकी सेवाके लिये ही है। विप्रवर! आपके प्रसादसे मुझे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हो सकती है ॥ ७७ ॥
अवेक्ष्या इति कृत्वाहं दृढभक्तेति वा द्विज ।
चिन्त्या ममेयमिति वा सक्तूनादातुमर्हसि ॥ ७८ ॥
अतः आप मुझे अपना दृढ़ भक्त, रक्षणीय और विचारणीय मानकर अतिथिको देनेके लिये यह सत्तू स्वीकार कीजिये ।। ७८ ।।
श्वशुर उवाच
अनेन नित्यं साध्वी त्वं शीलवृत्तेन शोभसे । या त्वं धर्मव्रतोपेता गुरुवृत्तिमवेक्षसे ।। ७९ ।। तस्मात् सक्तून् ग्रहीष्यामि वधु नार्हसि वञ्चनाम् । गणयित्वा महाभागे त्वां हि धर्मभृतां वरे ।। ८० ।। **श्वशुरने कहा—**बेटी! तुम सती-साध्वी नारी हो और सदा ऐसे ही शील एवं सदाचारका पालन करनेसे तुम्हारी शोभा है। तुम धर्म तथा व्रतके आचरणमें संलग्न होकर सर्वदा गुरुजनोंकी सेवापर ही दृष्टि रखती हो; इसलिये बहू! मैं तुम्हें पुण्यसे वंचित न होने दूँगा। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाभागे! पुण्यात्माओंमें तुम्हारी गिनती करके मैं तुम्हारा दिया हुआ सत्तू अवश्य स्वीकार करूँगा ।। ७९-८० ।।
इत्युक्त्वा तानुपादाय सक्तून् प्रादाद् द्विजातये । ततस्तुष्टोऽभवद् विप्रस्तस्य साधोर्महात्मनः ।। ८१ ।। ऐसा कहकर ब्राह्मणने उसके हिस्सेका भी सत्तू लेकर अतिथिको दे दिया। इससे वह ब्राह्मण उन उञ्छवृत्तिधारी साधु महात्मापर बहुत संतुष्ट हुआ ।। ८१ ।।
प्रीतात्मा स तु तं वाक्यमिदमाह द्विजर्षभम् । वाग्मी तदा द्विजश्रेष्ठो धर्मः पुरुषविग्रहः ।। ८२ ।। वास्तवमें उस श्रेष्ठ द्विजके रूपमें मानव-विग्रहधारी साक्षात् धर्म ही वहाँ उपस्थित थे। वे प्रवचनकुशल धर्म संतुष्टचित्त होकर उन उञ्छवृत्तिधारी श्रेष्ठ ब्राह्मणसे इस प्रकार बोले— ।। ८२ ।।
शुद्धेन तव दानेन न्यायोपात्तेन धर्मतः । यथाशक्ति विसृष्टेन प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम । अहो दानं घुष्यते ते स्वर्गे स्वर्गनिवासिभिः ।। ८३ ।। ‘द्विजश्रेष्ठ! तुमने अपनी शक्तिके अनुसार धर्मपूर्वक जो न्यायोपार्जित शुद्ध अन्नका दान दिया है, इससे तुम्हारे ऊपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अहो! स्वर्गलोकमें निवास करनेवाले देवता भी वहाँ तुम्हारे दानकी घोषणा करते हैं ।। ८३ ।।
गगनात् पुष्पवर्षं च पश्येदं पतितं भुवि । सुरर्षिदेवगन्धर्वा ये च देवपुरःसराः ।। ८४ ।। स्तुवन्तो देवदूताश्च स्थिता दानेन विस्मिताः ।
‘देखो, आकाशसे भूतलपर यह फूलोंकी वर्षा हो रही है। देवर्षि, देवता, गन्धर्व तथा और भी जो देवताओंके अग्रणी पुरुष हैं, वे और देवदूतगण तुम्हारे दानसे विस्मित हो तुम्हारी स्तुति करते हुए खड़े हैं॥ ८४ १/२ ॥ ब्रह्मर्षयो विमानस्था ब्रह्मलोकचराश्च ये ॥ ८५ ॥ काङ्क्षन्ते दर्शनं तुभ्यं दिवं व्रज द्विजर्षभ । ‘द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मलोकमें विचरनेवाले जो ब्रह्मर्षिगण विमानोंमें रहते हैं, वे भी तुम्हारे दर्शनकी इच्छा रखते हैं; इसलिये तुम स्वर्गलोकमें चलो॥ ८५ १/२ ॥ पितृलोकगताः सर्वे तारिताः पितरस्त्वया ॥ ८६ ॥ अनागताश्च बहवः सुबहूनि युगान्युत । ‘तुमने पितृलोकमें गये हुए अपने समस्त पितरोंका उद्धार कर दिया। अनेक युगोंतक भविष्यमें होनेवाली जो संतानें हैं, वे भी तुम्हारे पुण्य-प्रतापसे तर जायँगी’॥ ८६ १/२ ॥ ब्रह्मचर्येण दानेन यज्ञेन तपसा तथा ॥ ८७ ॥ असंकरेण धर्मेण तस्माद् गच्छ दिवं द्विज । ‘अतः ब्रह्मन्! तुम अपने ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, तप तथा संकरतारहित धर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चलो॥ ८७ १/२ ॥ श्रद्धया परया यस्त्वं तपश्चरसि सुव्रत ॥ ८८ ॥ तस्माद् देवाश्च दानेन प्रीता ब्राह्मणसत्तम । ‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणशिरोमणे! तुम उत्तम श्रद्धाके साथ तपस्या करते हो; इसलिये देवता तुम्हारे दानसे अत्यन्त संतुष्ट हैं॥ ८८ १/२ ॥ सर्वमेतद्धि यस्मात् ते दत्तं शुद्धेन चेतसा ॥ ८९ ॥ कृच्छ्रकाले ततः स्वर्गो विजितः कर्मणा त्वया । ‘इस प्राण-संकटके समय भी यह सब सत्तू तुमने शुद्ध हृदयसे दान किया है; इसलिये तुमने उस पुण्यकर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर ली है॥ ८९ १/२ ॥ क्षुधा निर्णुदति प्रज्ञां धर्मबुद्धिं व्यपोहति ॥ ९० ॥ क्षुधापरिगतज्ञानो धृतिं त्यजति चैव ह । बुभुक्षां जयते यस्तु स स्वर्गं जयते ध्रुवम् ॥ ९१ ॥ ‘भूख मनुष्यकी बुद्धिको चौपट कर देती है। धार्मिक विचारको मिटा देती है। क्षुधासे ज्ञान लुप्त हो जानेके कारण मनुष्य धीरज खो देता है। जो भूखको जीत लेता है, वह निश्चय ही स्वर्गपर विजय पाता है॥ ९०-९१॥ यदा दानरुचिः स्याद् वै तदा धर्मो न सीदति । अनवेक्ष्य सुतस्नेहं कलत्रस्नेहमेव च ॥ ९२ ॥ धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा तृष्णा न गणिता त्वया ।
‘जब मनुष्यमें दानविषयक रुचि जाग्रत् होती है, तब उसके धर्मका ह्रास नहीं होता। तुमने पत्नीके प्रेम और पुत्रके स्नेहपर भी दृष्टिपात न करके धर्मको ही श्रेष्ठ माना है और उसके सामने भूख-प्यासको भी कुछ नहीं गिना है ।। ९२ १/२ ।।
द्रव्यागमो नृणां सूक्ष्मः पात्रे दानं ततः परम् ।। ९३ ।।
कालः परतरो दानाच्छ्रद्धा चैव ततः परा ।
स्वर्गद्वारं सुसूक्ष्मं हि नरैर्मोहान्न दृश्यते ।। ९४ ।।
‘मनुष्यके लिये सबसे पहले न्यायपूर्वक धनकी प्राप्तिका उपाय जानना ही सूक्ष्म विषय है। उस धनको सत्पात्रकी सेवामें अर्पण करना उससे भी श्रेष्ठ है। साधारण समयमें दान देनेकी अपेक्षा उत्तम समयपर दान देना और भी अच्छा है; किंतु श्रद्धाका महत्त्व कालसे भी बढ़कर है। स्वर्गका दरवाजा अत्यन्त सूक्ष्म है। मनुष्य मोहवश उसे देख नहीं पाते हैं ।। ९३-९४ ।।
स्वर्गार्गलं लोभबीजं रागगुप्तं दुरासदम् ।
तं तु पश्यन्ति पुरुषा जितक्रोधा जितेन्द्रियाः ।। ९५ ।।
ब्राह्मणास्तपसा युक्ता यथाशक्ति प्रदायिनः ।
‘उस स्वर्गद्वारकी जो अर्गला (किल्ली) है, वह लोभरूपी बीजसे बनी हुई है। वह द्वार रागके द्वारा गुप्त है, इसीलिये उसके भीतर प्रवेश करना बहुत ही कठिन है। जो लोग क्रोधको जीत चुके हैं, इन्द्रियोंको वशमें कर चुके हैं, वे यथाशक्ति दान देनेवाले तपस्वी ब्राह्मण ही उस द्वारको देख पाते हैं ।। ९५ १/२ ।।
सहस्रशक्तिश्च शतं शतशक्तिर्दशापि च ।। ९६ ।।
दद्यादपश्च यः शक्त्या सर्वे तुल्यफलाः स्मृताः ।
‘श्रद्धापूर्वक दान देनेवाले मनुष्यमें यदि एक हजार देनेकी शक्ति हो तो वह सौका दान करे, सौ देनेकी शक्तिवाला दसका दान करे तथा जिसके पास कुछ न हो, वह यदि अपनी शक्तिके अनुसार जल ही दान कर दे तो इन सबका फल बराबर माना गया है ।। ९६ १/२ ।।
रन्तिदेवो हि नृपतिरपः प्रादादकिंचनः ।। ९७ ।।
शुद्धेन मनसा विप्र नाकपृष्ठं ततो गतः ।
‘विप्रवर! कहते हैं, राजा रन्तिदेवके पास जब कुछ भी नहीं रह गया, तब उन्होंने शुद्ध हृदयसे केवल जलका दान किया था। इससे वे स्वर्गलोकमें गये थे ।। ९७ १/२ ।।
न धर्मः प्रीयते तात दानैर्दत्तैर्महाफलैः ।। ९८ ।।
न्यायलब्धैर्यथा सूक्ष्मैः श्रद्धापूतैः स तुष्यति ।
‘तात! अन्यायपूर्वक प्राप्त हुए द्रव्यके द्वारा महान् फल देनेवाले बड़े-बड़े दान करनेसे धर्मको उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी न्यायोपार्जित थोड़े-से अन्नका भी श्रद्धापूर्वक दान करनेसे उन्हें प्रसन्नता होती है ।। ९८ १/२ ।।
गोप्रदानसहस्राणि द्विजेभ्योऽदान्नृगो नृपः ॥ ९९ ॥ एकां दत्त्वा स पारक्यां नरकं समपद्यत । ‘राजा नृगने ब्राह्मणोंको हजारों गौएँ दान की थीं; किंतु एक ही गौ दूसरेकी दान कर दी, जिससे अन्यायत: प्राप्त द्रव्यका दान करनेके कारण उन्हें नरकमें जाना पड़ा ॥ ९९ ½ ॥
आत्ममांसप्रदानेन शिबिरौशीनरो नृपः ॥ १०० ॥ प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकान् मोदते दिवि सुव्रतः । ‘उशीनरके पुत्र उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजा शिबि श्रद्धापूर्वक अपने शरीरका मांस देकर भी पुण्यात्माओंके लोकोंमें अर्थात् स्वर्गमें आनन्द भोगते हैं ॥ १०० ½ ॥
विभवो न नृणां पुण्यं स्वशक्त्या स्वार्जितं सताम् ॥ १०१ ॥ न यज्ञैर्विविधैर्विप्र यथान्यायेन संचितैः । ‘विप्रवर! मनुष्योंके लिये धन ही पुण्यका हेतु नहीं है। साधु पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार सुगमतापूर्वक पुण्यका अर्जन कर लेते हैं। न्यायपूर्वक संचित किये हुए अन्नके दानसे जैसा उत्तम फल प्राप्त होता है, वैसा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे भी नहीं सुलभ होता ॥ १०१ ½ ॥
क्रोधाद् दानफलं हन्ति लोभात् स्वर्गं न गच्छति ॥ १०२ ॥ न्यायवृत्तिर्हि तपसा दानवित् स्वर्गमश्नुते । ‘मनुष्य क्रोधसे अपने दानके फलको नष्ट कर देता है। लोभके कारण वह स्वर्गमें नहीं जाने पाता। न्यायोपार्जित धनसे जीवन-निर्वाह करनेवाला और दानके महत्त्वको जाननेवाला पुरुष दान एवं तपस्याके द्वारा स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है ॥ १०२ ½ ॥
न राजसूयैर्बहुभिरिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः ॥ १०३ ॥ न चाश्वमेधैर्बहुभिः फलं सममिदं तव । सक्तुप्रस्थेन विजितो ब्रह्मलोकस्त्वयाक्षयः ॥ १०४ ॥ ‘तुमने जो यह दानजनित फल प्राप्त किया है, इसकी समता प्रचुर दक्षिणावाले बहुसंख्यक राजसूय और अनेक अश्वमेध-यज्ञोंद्वारा भी नहीं हो सकती। तुमने सेरभर सत्तूका दान करके अक्षय ब्रह्मलोकको जीत लिया है ॥ १०३-१०४ ॥
विरजो ब्रह्मसदनं गच्छ विप्र यथासुखम् । सर्वेषां वो द्विजश्रेष्ठ दिव्यं यानमुपस्थितम् ॥ १०५ ॥ ‘विप्रवर! अब तुम सुखपूर्वक रजोगुणरहित ब्रह्मलोकमें जाओ। द्विजश्रेष्ठ! तुम सब लोगोंके लिये यह दिव्य विमान उपस्थित है ॥ १०५ ॥
आरोहत यथाकामं धर्मोऽस्मि द्विज पश्य माम् । तारितो हि त्वया देहो लोके कीर्तिः स्थिरा च ते ॥ १०६ ॥ सभार्यः सहपुत्रश्च सस्नुषश्च दिवं व्रज ।
‘ब्रह्मन्! मेरी ओर देखो, मैं धर्म हूँ। तुम सब लोग अपनी इच्छाके अनुसार इस विमानपर चढ़ो। तुमने अपने इस शरीरका उद्धार कर दिया और लोकमें भी तुम्हारी अविचल कीर्ति बनी रहेगी। तुम पत्नी, पुत्र और पुत्रवधूके साथ स्वर्गलोकको जाओ' ।। १०६ १/२ ।।
इत्युक्तवाक्ये धर्मे तु यानमारुह्य स द्विजः ।। १०७ ।। सदारः ससुतश्चैव सस्नुषश्च दिवं गतः ।
धर्मके ऐसा कहनेपर वे उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मण देवता अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधूके साथ विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको चले गये ।। १०७ १/२ ।।
तस्मिन् विप्रे गते स्वर्गं ससुते सस्नुषे तदा ।। १०८ ।। भार्याचतुर्थे धर्मज्ञे ततोऽहं निःसृतो बिलात् ।
‘स्त्री, पुत्र और पुत्रवधूके साथ वे धर्मज्ञ ब्राह्मण जब स्वर्गलोकको चले गये, तब मैं अपनी बिलसे बाहर निकला ।। १०८ १/२ ।।
ततस्तु सक्तुगन्धेन क्लेदेन सलिलस्य च ।। १०९ ।। दिव्यपुष्पविमर्दाश्च साधोर्दानलवैश्च तैः । विप्रस्य तपसा तस्य शिरो मे काञ्चनीकृतम् ।। ११० ।।
तदनन्तर सत्तूकी गन्ध सूँघने, वहाँ गिरे हुए जलकी कीचसे सम्पर्क होने, वहाँ गिरे हुए दिव्य पुष्पोंको रौंदने और उन महात्मा ब्राह्मणके दान करते समय गिरे हुए अन्नके कणोंमें मन लगानेसे तथा उन उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणकी तपस्याके प्रभावसे मेरा मस्तक सोनेका हो गया ।। १०९-११० ।।
तस्य सत्याभिसंधस्य सक्तुदानेन चैव ह । शरीरार्धं च मे विप्राः शातकुम्भमयं कृतम् ।। १११ ।।
विप्रवरो! उन सत्यप्रतिज्ञ ब्राह्मणके सत्तूदानसे मेरा यह आधा शरीर भी सुवर्णमय हो गया ।। १११ ।।
पश्यतेमं सुविपुलं तपसा तस्य धीमतः । कथमेवंविधं स्याद् वै पार्श्वमन्यदिति द्विजाः ।। ११२ ।।
उन बुद्धिमान् ब्राह्मणकी तपस्यासे मुझे जो यह महान् फल प्राप्त हुआ है, इसे आपलोग अपनी आँखों देख लीजिये। ब्राह्मणो! अब मैं इस चिन्तामें पड़ा कि मेरे शरीरका दूसरा पार्श्व भी कैसे ऐसा ही हो सकता है? ।। ११२ ।।
तपोवनानि यज्ञांश्च हृष्टोऽभ्येमि पुनः पुनः । यज्ञं त्वहमिमं श्रुत्वा कुरुराजस्य धीमतः ।। ११३ ।। आशया परया प्राप्तो न चाहं काञ्चनीकृतः ।
इसी उद्देश्यसे मैं बड़े हर्ष और उत्साहके साथ बारंबार अनेकानेक तपोवनों और यज्ञस्थलोंमें जाया-आया करता हूँ। परम बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिरके इस यज्ञका बड़ा भारी शोर सुनकर मैं बड़ी आशा लगाये यहाँ आया था; किंतु मेरा शरीर यहाँ सोनेका न हो सका ।। ११३ १/२ ।।
ततो मयोक्तं तद् वाक्यं प्रहस्य ब्राह्मणर्षभाः ॥ ११४ ॥
सक्तुप्रस्थेन यज्ञोऽयं संमितो नेति सर्वथा ।
ब्राह्मणशिरोमणियो! इसीसे मैंने हँसकर कहा था कि यह यज्ञ ब्राह्मणके दिये हुए सेरभर सत्तूके बराबर भी नहीं है। सर्वथा ऐसी ही बात है ।। ११४ १/२ ।।
सक्तुप्रस्थलवैस्तैर्हि तदाहं काञ्चनीकृतः ॥ ११५ ॥
नहि यज्ञो महानेष सदृशस्तैर्मतो मम ।
क्योंकि उस समय सेरभर सत्तूमेंसे गिरे हुए कुछ कणोंके प्रभावसे मेरा आधा शरीर सुवर्णमय हो गया था; परंतु यह महान् यज्ञ भी मुझे वैसा न बना सका; अतः मेरे मतमें यह यज्ञ उन सेरभर सत्तूके कणोंके समान भी नहीं है ।। ११५ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा नकुलः सर्वान् यज्ञे द्विजवरांस्तदा ॥ ११६ ॥
जगामादर्शनं तेषां विप्रास्ते च ययुर्गृहान् ॥ ११७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यज्ञस्थलमें उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे ऐसा कहकर वह नेवला वहाँसे गायब हो गया और वे ब्राह्मण भी अपने-अपने घर चले गये ।। ११६-११७ ।।
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया परपुरंजय ।
यदाश्चर्यमभूत् तत्र वाजिमेधे महाक्रतौ ॥ ११८ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले जनमेजय! वहाँ अश्वमेध नामक महायज्ञमें जो आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी, वह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें बता दिया ।। ११८ ।।
न विस्मयस्ते नृपते यज्ञे कार्यः कथंचन ।
ऋषिकोटिसहस्राणि तपोभिर्ये दिवं गताः ॥ ११९ ॥
नरेश्वर! उस यज्ञके सम्बन्धमें ऐसी घटना सुनकर तुम्हें किसी प्रकार विस्मय नहीं करना चाहिये। सहस्रों कोटि ऐसे ऋषि हो गये हैं, जो यज्ञ न करके केवल तपस्याके ही बलसे दिव्य लोकको प्राप्त हो चुके हैं ।। ११९ ।।
अद्रोहः सर्वभूतेषु संतोषः शीलमार्जवम् ।
तपो दमश्च सत्यं च प्रदानं चेति संमितम् ॥ १२० ॥
किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, मनमें संतोष रखना, शील और सदाचारका पालन करना, सबके प्रति सरलतापूर्ण बर्ताव करना, तपस्या करना, मन और इन्द्रियोंको संयममें
रखना, सत्य बोलना और न्यायोपार्जित वस्तुका श्रद्धापूर्वक दान करना—इनमेंसे एक-एक गुण बड़े-बड़े यज्ञोंके समान हैं ॥ १२० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि नकुलाख्याने नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें नकुलोपाख्यानविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥
हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा
एकनवतितमोऽध्यायः
हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा
जनमेजय उवाच
यज्ञे सत्ता नृपतयस्तपःसत्ता महर्षयः ।
शान्तिव्यवस्थिता विप्राः शमे दम इति प्रभो ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— प्रभो! राजालोग यज्ञमें संलग्न होते हैं, महर्षि तपस्यामें तत्पर रहते हैं और ब्राह्मणलोग शान्ति (मनोनिग्रह)-में स्थित होते हैं। मनका निग्रह हो जानेपर इन्द्रियोंका संयम स्वतः सिद्ध हो जाता है ॥ १ ॥
तस्माद् यज्ञफलैस्तुल्यं न किंचिदिह दृश्यते ।
इति मे वर्तते बुद्धिस्तथा चैतदसंशयम् ॥ २ ॥
अतः यज्ञफलकी समानता करनेवाला कोई कर्म यहाँ मुझे नहीं दिखायी देता है। यज्ञके सम्बन्धमें मेरा तो ऐसा ही विचार है और निःसंदेह यही ठीक है ॥ २ ॥
यज्ञैरिष्ट्वा तु बहवो राजानो द्विजसत्तमाः ।
इह कीर्तिं परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्नुयुः ॥ ३ ॥
यज्ञोंका अनुष्ठान करके बहुत-से राजा और श्रेष्ठ ब्राह्मण इहलोकमें उत्तम कीर्ति पाकर मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ३ ॥
देवराजः सहस्राक्षः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
देवराज्यं महातेजाः प्राप्तवानखिलं विभुः ॥ ४ ॥
सहस्र नेत्रधारी महातेजस्वी देवराज भगवान् इन्द्रने बहुत-सी दक्षिणावाले बहुसंख्यक यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका समस्त साम्राज्य प्राप्त किया था ॥ ४ ॥
यदा युधिष्ठिरो राजा भीमार्जुनपुरःसरः ।
सदृशो देवराजेन समृद्ध्या विक्रमेण च ॥ ५ ॥
भीम और अर्जुनको आगे रखकर राजा युधिष्ठिर भी समृद्धि और पराक्रमकी दृष्टिसे देवराज इन्द्रके ही तुल्य थे ॥ ५ ॥
अथ कस्मात् स नकुलो गर्हयामास तं क्रतुम् ।
अश्वमेधं महायज्ञं राज्ञस्तस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
फिर उस नेवलेने महात्मा राजा युधिष्ठिरके उस अश्वमेध नामक महायज्ञकी निन्दा क्यों की? ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
यज्ञस्य विधिमग्र्यं वै फलं चापि नराधिप ।
गदतः शृणु मे राजन् यथावदिह भारत ॥ ७ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**नरेश्वर! भरतनन्दन! मैं यज्ञकी श्रेष्ठ विधि और फलका यहाँ यथावत् वर्णन करता हूँ, तुम मेरा कथन सुनो ॥ ७ ॥
पुरा शक्रस्य यजतः सर्व ऊचुर्महर्षयः ।
ऋत्विक्षु कर्मव्यग्रेषु वितते यज्ञकर्मणि ॥ ८ ॥
हूयमाने तथा वह्नौ होत्रे गुणसमन्विते ।
देवेष्वाहूयमानेषु स्थितेषु परमर्षिषु ॥ ९ ॥
सुप्रतीतैस्तथा विप्रैः स्वागमैः सुस्वरैर्नृप ।
अश्रान्तैश्चापि लघुभिरध्वर्युवृषभैस्तथा ॥ १० ॥
आलम्भसमये तस्मिन् गृहीतेषु पशुष्वथ ।
महर्षयो महाराज बभूवुः कृपयान्विताः ॥ ११ ॥
राजन्! प्राचीन कालकी बात है, जब इन्द्रका यज्ञ हो रहा था और सब महर्षि मन्त्रोच्चारण कर रहे थे, ऋत्विज्लोग अपने-अपने कर्मोंमें लगे थे, यज्ञका काम बड़े समारोह और विस्तारके साथ चल रहा था, उत्तम गुणोंसे युक्त आहुतियोंका अग्निमें हवन किया जा रहा था, देवताओंका आवाहन हो रहा था, बड़े-बड़े महर्षि खड़े थे, ब्राह्मणलोग बड़ी प्रसन्नताके साथ वेदोक्त मन्त्रोंका उत्तम स्वरसे पाठ करते थे और शीघ्रकारी उत्तम अध्वर्युगण बिना किसी थकावटके अपने कर्तव्यका पालन कर रहे थे। इतनेहीमें पशुओंके आलम्भका समय आया। महाराज! जब पशु पकड़ लिये गये, तब महर्षियोंको उनपर बड़ी दया आयी ॥ ८—११ ॥
ततो दीनान् पशून् दृष्ट्वा ऋषयस्ते तपोधनाः ।
ऊचुः शक्रं समागम्य नायं यज्ञविधिः शुभः ॥ १२ ॥
उन पशुओंकी दयनीय अवस्था देखकर वे तपोधन ऋषि इन्द्रके पास जाकर बोले—'यह जो यज्ञमें पशुवधका विधान है, यह शुभकारक नहीं है ॥ १२ ॥
अपरिज्ञानमेतत् ते महान्तं धर्ममिच्छतः ।
न हि यज्ञे पशुगणा विधिदृष्टाः पुरंदर ॥ १३ ॥
'पुरंदर! आप महान् धर्मकी इच्छा करते हैं तो भी जो पशुवधके लिये उद्यत हो गये हैं, यह आपका अज्ञान ही है; क्योंकि यज्ञमें पशुओंके वधका विधान शास्त्रमें नहीं देखा गया है ॥ १३ ॥
धर्मोपघातकस्त्वेष समारम्भस्तव प्रभो ।
नायं धर्मकृतो यज्ञो न हिंसा धर्म उच्यते ॥ १४ ॥
'प्रभो! आपने जो यज्ञका समारम्भ किया है, यह धर्मको हानि पहुँचानेवाला है। यह यज्ञ धर्मके अनुकूल नहीं है, क्योंकि हिंसाको कहीं भी धर्म नहीं कहा गया है ॥ १४ ॥
आगमेनैव ते यज्ञं कुर्वन्तु यदि चेच्छसि ॥ १५ ॥
विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मस्ते सुमहान् भवेत् ।
‘यदि आपकी इच्छा हो तो ब्राह्मणलोग शास्त्रके अनुसार ही इस यज्ञका अनुष्ठान करें। शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञ करनेसे आपको महान् धर्मकी प्राप्ति होगी ॥ १५ १/२ ॥
यज बीजैः सहस्राक्ष त्रिवर्षपरमोषितैः ॥ १६ ॥
एष धर्मो महान् शक्र महागुणफलोदयः ।
‘सहस्र नेत्रधारी इन्द्र! आप तीन वर्षके पुराने बीजों (जौ, गेहूँ आदि अनाजों)-से यज्ञ करें। यही महान् धर्म है और महान् गुणकारक फलकी प्राप्ति करानेवाला है’ ॥ १६ १/२ ॥
शतक्रतुस्तु तद् वाक्यमृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १७ ॥
उक्तं न प्रतिजग्राह मानान्मोहवशं गतः ।
तत्त्वदर्शी ऋषियोंके कहे हुए इस वचनको इन्द्रने अभिमानवश नहीं स्वीकार किया। वे मोहके वशीभूत हो गये थे ॥ १७ १/२ ॥
तेषां विवादः सुमहान् शक्रयज्ञे तपस्विनाम् ॥ १८ ॥
जङ्गमैः स्थावरैर्वापि यष्टव्यमिति भारत ।
इन्द्रके उस यज्ञमें जुटे हुए तपस्वी लोगोंमें इस प्रश्नको लेकर महान् विवाद खड़ा हो गया। भारत! एक पक्ष कहता था कि जंगम पदार्थ (पशु आदि)-के द्वारा यज्ञ करना चाहिये और दूसरा पक्ष कहता था कि स्थावर वस्तुओं (अन्न-फल आदि)-के द्वारा यजन करना उचित है ॥ १८ १/२ ॥
ते तु खिन्ना विवादेन ऋषयस्तत्त्वदर्शिनः ॥ १९ ॥
तदा संधाय शक्रेण पप्रच्छुर्नृपतिं वसुम् ।
धर्मसंशयमापन्नान् सत्यं ब्रूहि महामते ॥ २० ॥
भरतनन्दन! वे तत्त्वदर्शी ऋषि जब इस विवादसे बहुत खिन्न हो गये, तब उन्होंने इन्द्रके साथ सलाह लेकर इस विषयमें राजा उपरिचर वसुसे पूछा—‘महामते! हमलोग धर्मविषयक संदेहमें पड़े हुए हैं। आप हमसे सच्ची बात बताइये ॥ १९-२० ॥
महाभाग कथं यज्ञेष्वागमो नृपसत्तम ।
यष्टव्यं पशुभिर्मुख्यैरथो बीजै रसैरिति ॥ २१ ॥
‘महाभाग नृपश्रेष्ठ! यज्ञोंके विषयमें शास्त्रका मत कैसा है? मुख्य-मुख्य पशुओंद्वारा यज्ञ करना चाहिये अथवा बीजों एवं रसोंद्वारा’ ॥ २१ ॥
तच्छ्रुत्वा तु वसुस्तेषामविचार्य बलाबलम् ।
यथोपनीतैर्यष्टव्यमिति प्रोवाच पार्थिवः ॥ २२ ॥
यह सुनकर राजा वसुने उन दोनों पक्षोंके कथनमें कितना सार या असार है, इसका विचार न करके यों ही बोल दिया कि ‘जब जो वस्तु मिल जाय, उसीसे यज्ञ कर लेना चाहिये’ ॥ २२ ॥
एवमुक्त्वा स नृपतिः प्रविवेश रसातलम् ।
उक्त्वाथ वितथं प्रश्नं चेदीनामीश्वरः प्रभुः ॥ २३ ॥
इस प्रकार कहकर असत्य निर्णय देनेके कारण चेदिराज वसुको रसातलमें जाना पड़ा ॥ २३ ॥
तस्मान्न वाच्यं ह्येकेन बहुज्ञेनापि संशये ।
प्रजापतिमपाहाय स्वयम्भुवमृते प्रभुम् ॥ २४ ॥
अतः कोई संदेह उपस्थित होनेपर स्वयम्भू भगवान् प्रजापतिको छोड़कर अन्य किसी बहुज्ञ पुरुषको भी अकेले कोई निर्णय नहीं देना चाहिये ॥ २४ ॥
तेन दत्तानि दानानि पापेनाशुद्धबुद्धिना ।
तानि सर्वाण्यनादृत्य नश्यन्ति विफुलान्यपि ॥ २५ ॥
उस अशुद्ध बुद्धिवाले पापी पुरुषके दिये हुए दान कितने ही अधिक क्यों न हों, वे सब-के-सब अनाहत होकर नष्ट हो जाते हैं ॥ २५ ॥
तस्याधर्मप्रवृत्तस्य हिंसकस्य दुरात्मनः ।
दानेन कीर्तिर्भवति न प्रेत्येह च दुर्मतेः ॥ २६ ॥
अधर्ममें प्रवृत्त हुए दुर्बुद्धि दुरात्मा हिंसक मनुष्य जो दान देते हैं, उससे इहलोक या परलोकमें उनकी कीर्ति नहीं होती ॥ २६ ॥
अन्यायोपगतं द्रव्यमभीक्ष्णं यो ह्यपण्डितः ।
धर्माभिशंकी यजते न स धर्मफलं लभेत् ॥ २७ ॥
जो मूर्ख अन्यायोपार्जित धनका बारंबार संग्रह करके धर्मके विषयमें संशय रखते हुए यजन करता है, उसे धर्मका फल नहीं मिलता ॥ २७ ॥
धर्मवैतंसिको यस्तु पापात्मा पुरुषाधमः ।
ददाति दानं विप्रेभ्यो लोकविश्वासकारणम् ॥ २८ ॥
जो धर्मध्वजी, पापात्मा एवं नराधम है, वह लोकमें अपना विश्वास जमानेके लिये ब्राह्मणोंको दान देता है, धर्मके लिये नहीं ॥ २८ ॥
पापेन कर्मणा विप्रो धनं प्राप्य निरङ्कुशः ।
रागमोहान्वितः सोऽन्ते कलुषां गतिमश्नुते ॥ २९ ॥
जो ब्राह्मण पापकर्मसे धन पाकर उच्छृंखल हो राग और मोहके वशीभूत हो जाता है, वह अन्तमें कलुषित गतिको प्राप्त होता है ॥ २९ ॥
अपि संचयबुद्धिर्हि लोभमोहवशंगतः ।
उद्वेजयति भूतानि पापेनाशुद्धबुद्धिना ॥ ३० ॥
वह लोभ और मोहके वशमें पड़कर संग्रह करनेकी बुद्धिको अपनाता है। कृपणतापूर्वक पैसे बटोरनेका विचार रखता है। फिर बुद्धिको अशुद्ध कर देनेवाले पापाचारके द्वारा प्राणियोंको उद्वेगमें डाल देता है ॥ ३० ॥
एवं लब्ध्वा धनं मोहाद् यो हि दद्याद् यजेत वा ।
न तस्य स फलं प्रेत्य भुङ्क्ते पापधनागमात् ॥ ३१ ॥
इस प्रकार जो मोहवश अन्यायसे धनका उपार्जन करके उसके द्वारा दान या यज्ञ करता है, वह मरनेके बाद भी उसका फल नहीं पाता; क्योंकि वह धन पापसे मिला हुआ होता है ॥ ३१ ॥
उञ्छं मूलं फलं शाकमुदपात्रं तपोधनाः ।
दानं विभवतो दत्त्वा नराः स्वर्यान्ति धार्मिकाः ॥ ३२ ॥
तपस्याके धनी धर्मात्मा पुरुष उञ्छ (बीने हुए अन्न), फल, मूल, शाक और जलपात्रका ही अपनी शक्तिके अनुसार दान करके स्वर्गलोकमें चले जाते हैं ॥ ३२ ॥
एष धर्मो महायोगो दानं भूतदया तथा ।
ब्रह्मचर्यं तथा सत्यमनुक्रोशो धृतिः क्षमा ॥ ३३ ॥
सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतत् सनातनम् ।
श्रूयन्ते हि पुरा वृत्ता विश्वामित्रादयो नृपाः ॥ ३४ ॥
यही धर्म है, यही महान् योग है, दान, प्राणियोंपर दया, ब्रह्मचर्य, सत्य, करुणा, धृति और क्षमा—ये सनातन धर्मके सनातन मूल हैं। सुना जाता है कि पूर्वकालमें विश्वामित्र आदि नरेश इसीसे सिद्धिको प्राप्त हुए थे ॥ ३३-३४ ॥
विश्वामित्रोऽसितश्चैव जनकश्च महीपतिः ।
कक्षसेनार्ष्टिषेणौ च सिन्धुद्वीपश्च पार्थिवः ॥ ३५ ॥
एते चान्ये च बहवः सिद्धिं परमिकां गताः ।
नृपाः सत्यैश्च दानैश्च न्यायलब्धैस्तपोधनाः ॥ ३६ ॥
विश्वामित्र, असित, राजा जनक, कक्षसेन, आर्ष्टिषेण और भूपाल सिन्धुद्वीप—ये तथा अन्य बहुत-से राजा तथा तपस्वी न्यायोपार्जित धनके दान और सत्यभाषणद्वारा परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥ ३५-३६ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये चाश्रितास्तपः ।
दानधर्माग्निना शुद्धास्ते स्वर्गं यान्ति भारत ॥ ३७ ॥
भरतनन्दन! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जो भी तपका आश्रय लेते हैं, वे दानधर्मरूपी अग्निसे तपकर सुवर्णके समान शुद्ध हो स्वर्गलोकको जाते हैं ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि
हिंसामिश्रधर्मनिन्दायामेकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें हिंसामिश्रित धर्मकी निन्दाविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥
महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा
द्विनवतितमोऽध्यायः
महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा
जनमेजय उवाच
धर्मागतेन त्यागेन भगवन् स्वर्गमस्ति चेत् ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि भाषितुम् ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— भगवन्! धर्मके द्वारा प्राप्त हुए धनका दान करनेसे यदि स्वर्ग मिलता है तो यह सब विषय मुझे स्पष्टरूपसे बताइये; क्योंकि आप प्रवचन करनेमें कुशल हैं ॥ १ ॥
तस्योञ्छवृत्तेर्यद् वृत्तं सक्तुदाने फलं महत् ।
कथितं तु मम ब्रह्मंस्तथ्यमेतदसंशयम् ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! उञ्छवृत्ति धारण करनेवाले ब्राह्मणको न्यायतः प्राप्त हुए सत्तूका दान करनेसे जिस महान् फलकी प्राप्ति हुई, उसका आपने मुझसे वर्णन किया। निस्संदेह यह सब ठीक है ॥ २ ॥
कथं हि सर्वयज्ञेषु निश्चयः परमोऽभवत् ।
एतदर्हसि मे वक्तुं निखिलेन द्विजर्षभ ॥ ३ ॥
परंतु सभी यज्ञोंमें यह उत्तम निश्चय कैसे कार्यान्वित किया जा सकता है। द्विजश्रेष्ठ! इस विषयका मुझसे पूर्णतः प्रतिपादन कीजिये ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अगस्त्यस्य महायज्ञे पुरावृत्तमरिंदम ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! इस विषयमें पहले अगस्त्य मुनिके महान् यज्ञमें जो घटना घटित हुई थी, उस प्राचीन इतिहासका जानकार मनुष्य उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥
पुरागस्त्यो महातेजा दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।
प्रविवेश महाराज सर्वभूतहिते रतः ॥ ५ ॥
महाराज! पहलेकी बात है, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेवाले महातेजस्वी अगस्त्य मुनिने एक समय बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाले यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ५ ॥
तत्राग्निकल्पा होतार आसन् सत्रे महात्मनः ।
मूलाहाराः फलाहाराः साश्मकुट्टा मरीचिपाः ॥ ६ ॥
परिपृष्टिका वैघसिकाः प्रसंख्यानास्तथैव च ।
यतयो भिक्षवश्चात्र बभूवुः पर्यवस्थिताः ॥ ७ ॥ उन महात्माके यज्ञमें अग्निके समान तेजस्वी होता थे। जिनमें फल, मूलका आहार करनेवाले, अश्मकुट्ट^१, मरीचिप^२, परिपृष्टिक^३, वैघसिक^४ और प्रसंख्याने^५ आदि अनेक प्रकारके यति एवं भिक्षु उपस्थित थे ॥ ६-७ ॥ सर्वे प्रत्यक्षधर्माणो जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । दमे स्थिताश्च सर्वे ते हिंसादम्भविवर्जिताः ॥ ८ ॥ वृत्ते शुद्धे स्थिता नित्यमिन्द्रियैश्चाप्यबाधिताः । उपातिष्ठन्त तं यज्ञं यजन्तस्ते महर्षयः ॥ ९ ॥ वे सब-के-सब प्रत्यक्ष धर्मका पालन करनेवाले, क्रोध-विजयी, जितेन्द्रिय, मनोनिग्रहपरायण, हिंसा और दम्भसे रहित तथा सदा शुद्ध सदाचारमें स्थित रहनेवाले थे। उन्हें किसी भी इन्द्रियके द्वारा कभी बाधा नहीं पहुँचती थी। ऐसे-ऐसे महर्षि वह यज्ञ करानेके लिये वहाँ उपस्थित थे ॥ ८-९ ॥ यथाशक्त्या भगवता तदन्नं समुपार्जितम् । तस्मिन् सत्रे तु यद् वृत्तं यद् योग्यं च तदाभवत् ॥ १० ॥ भगवान् अगस्त्य मुनिने उस यज्ञके लिये यथाशक्ति विशुद्ध अन्नका संग्रह किया था। उस समय उस यज्ञमें वही हुआ, जो उसके योग्य था ॥ १० ॥ तथा ह्यनेकैर्मुनिभिर्महान्तः क्रतवः कृताः । एवंविधे त्वगस्त्यस्य वर्तमाने तथाध्वरे । न ववर्ष सहस्राक्षस्तदा भरतसत्तम ॥ ११ ॥ उनके सिवा और भी अनेक मुनियोंने बड़े-बड़े यज्ञ किये थे। भरतश्रेष्ठ! महर्षि अगस्त्यका ऐसा यज्ञ जब चालू हो गया, तब देवराज इन्द्रने वहाँ वर्षा बंद कर दी ॥ ११ ॥ ततः कर्मान्तरे राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः । कथेयमभिनिर्वृत्ता मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥ राजन्! तब यज्ञकर्मके बीचमें अवकाश मिलनेपर जब विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनि एक-दूसरेसे मिलकर एक स्थानपर बैठे, तब उनमें महात्मा अगस्त्यजीके सम्बन्धमें इस प्रकार चर्चा होने लगी— ॥ १२ ॥ अगस्त्यो यजमानोऽसौ ददात्यन्नं विमत्सरः । न च वर्षति पर्जन्यः कथमन्नं भविष्यति ॥ १३ ॥ 'महर्षियो! सुप्रसिद्ध अगस्त्य मुनि हमारे यजमान हैं। वे ईर्ष्यारहित हो श्रद्धापूर्वक सबको अन्न देते हैं। परंतु इधर मेघ जलकी वर्षा नहीं कर रहा है। तब भविष्यमें अन्न कैसे पैदा होगा? ॥ १३ ॥ सत्रं चेदं महत् विप्रा मुनेर्द्वादशवार्षिकम् । न वर्षिष्यति देवश्च वर्षाण्येतानि द्वादश ॥ १४ ॥
'ब्राह्मणो! मुनिका यह महान् सत्र बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाला है; परंतु इन्द्रदेव इन बारह वर्षोंमें वर्षा नहीं करेंगे ।। १४ ।। एतद् भवन्तः संचिन्त्य महर्षेरस्य धीमतः । अगस्त्यस्यातितपसः कर्तुमर्हन्त्यनुग्रहम् ।। १५ ।। 'यह सोचकर आपलोग इन अत्यन्त तपस्वी बुद्धिमान् महर्षि अगस्त्यपर अनुग्रह करें (जिससे इनका यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो जाय)' ।। १५ ।। इत्येवमुक्ते वचने ततोऽगस्त्यः प्रतापवान् ।। १६ ।। प्रोवाच वाक्यं स तदा प्रसाद्य शिरसा मुनीन् । उनके ऐसा कहनेपर प्रतापी अगस्त्य उन मुनियोंको सिरसे प्रणाम करके उन्हें राजी करते हुए इस प्रकार बोले— ।। १६ १/२ ।। यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १७ ।। चिन्तायज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः । 'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं चिन्तनमात्रके द्वारा मानसिक यज्ञ करूँगा। यह यज्ञकी सनातन विधि है ।। १७ १/२ ।। यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १८ ।। स्पर्शयज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः । 'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं स्पर्शयज्ञ* करूँगा। यह भी यज्ञकी सनातन विधि है' ।। १८ १/२ ।। यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १९ ।। ध्येयात्मना हरिष्यामि यज्ञानेतान् यतव्रतः । 'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं व्रत-नियमोंका पालन करता हुआ ध्यानद्वारा ध्येयरूपसे स्थित हो इन यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा ।। १९ १/२ ।। बीजयज्ञो मयायं वै बहुवर्षसमाचितः ।। २० ।। बीजैर्हि तं करिष्यामि नात्र विघ्नो भविष्यति । 'यह बीज-यज्ञ मैंने बहुत वर्षोंसे संचित कर रखा है। उन बीजोंसे ही मैं अपना यज्ञ पूरा कर लूँगा। इसमें कोई विघ्न नहीं होगा ।। २० १/२ ।। नेदं शक्यं वृथा कर्तुं मम सत्रं कथंचन ।। २१ ।। वर्षिष्यतीह वा देवो न वा वर्षं भविष्यति । 'इन्द्रदेव यहाँ वर्षा करें अथवा यहाँ वर्षा न हो, इसकी मुझे परवा नहीं है, मेरे इस यज्ञको किसी तरह व्यर्थ नहीं किया जा सकता ।। २१ १/२ ।। अथवाभ्यर्थनामिन्द्रो न करिष्यति कामतः ।। २२ ।। स्वयमिन्द्रो भविष्यामि जीवयिष्यामि च प्रजाः ।
‘अथवा यदि इन्द्र इच्छानुसार जल बरसानेके लिये की हुई मेरी प्रार्थना पूर्ण नहीं करेंगे तो मैं स्वयं इन्द्र हो जाऊँगा और समस्त प्रजाके जीवनकी रक्षा करूँगा।। यो यदाहारजातश्च स तथैव भविष्यति ॥ २३ ॥ विशेषं चैव कर्तास्मि पुनः पुनरतीव हि । ‘जो जिस आहारसे उत्पन्न हुआ है, उसे वही प्राप्त होगा तथा मैं बारंबार अधिक मात्रामें विशेष आहारकी भी व्यवस्था करूँगा ।। २३ १/२ ।। अद्येह स्वर्णमभ्येतु यच्चान्यद् वसु किंचन ॥ २४ ॥ त्रिषु लोकेषु यच्चास्ति तदिहागम्यतां स्वयम् । ‘तीनों लोकोंमें जो सुवर्ण या दूसरा कोई धन है, वह सब आज यहाँ स्वतः आ जाय ।। २४ १/२ ।। दिव्याश्चाप्सरसां संघा गन्धर्वाश्च सकिन्नराः ॥ २५ ॥ विश्वावसुश्च ये चान्ये तेऽप्युपासन्तु मे मखम् ।