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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2063, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2063

'ब्राह्मणो! मुनिका यह महान् सत्र बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाला है; परंतु इन्द्रदेव इन बारह वर्षोंमें वर्षा नहीं करेंगे ।। १४ ।। एतद् भवन्तः संचिन्त्य महर्षेरस्य धीमतः । अगस्त्यस्यातितपसः कर्तुमर्हन्त्यनुग्रहम् ।। १५ ।। 'यह सोचकर आपलोग इन अत्यन्त तपस्वी बुद्धिमान् महर्षि अगस्त्यपर अनुग्रह करें (जिससे इनका यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो जाय)' ।। १५ ।। इत्येवमुक्ते वचने ततोऽगस्त्यः प्रतापवान् ।। १६ ।। प्रोवाच वाक्यं स तदा प्रसाद्य शिरसा मुनीन् । उनके ऐसा कहनेपर प्रतापी अगस्त्य उन मुनियोंको सिरसे प्रणाम करके उन्हें राजी करते हुए इस प्रकार बोले— ।। १६ १/२ ।। यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १७ ।। चिन्तायज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः । 'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं चिन्तनमात्रके द्वारा मानसिक यज्ञ करूँगा। यह यज्ञकी सनातन विधि है ।। १७ १/२ ।। यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १८ ।। स्पर्शयज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातनः । 'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं स्पर्शयज्ञ* करूँगा। यह भी यज्ञकी सनातन विधि है' ।। १८ १/२ ।। यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः ।। १९ ।। ध्येयात्मना हरिष्यामि यज्ञानेतान् यतव्रतः । 'यदि इन्द्र बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं करेंगे तो मैं व्रत-नियमोंका पालन करता हुआ ध्यानद्वारा ध्येयरूपसे स्थित हो इन यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा ।। १९ १/२ ।। बीजयज्ञो मयायं वै बहुवर्षसमाचितः ।। २० ।। बीजैर्हि तं करिष्यामि नात्र विघ्नो भविष्यति । 'यह बीज-यज्ञ मैंने बहुत वर्षोंसे संचित कर रखा है। उन बीजोंसे ही मैं अपना यज्ञ पूरा कर लूँगा। इसमें कोई विघ्न नहीं होगा ।। २० १/२ ।। नेदं शक्यं वृथा कर्तुं मम सत्रं कथंचन ।। २१ ।। वर्षिष्यतीह वा देवो न वा वर्षं भविष्यति । 'इन्द्रदेव यहाँ वर्षा करें अथवा यहाँ वर्षा न हो, इसकी मुझे परवा नहीं है, मेरे इस यज्ञको किसी तरह व्यर्थ नहीं किया जा सकता ।। २१ १/२ ।। अथवाभ्यर्थनामिन्द्रो न करिष्यति कामतः ।। २२ ।। स्वयमिन्द्रो भविष्यामि जीवयिष्यामि च प्रजाः ।

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 2063, कुल 2566 में से · BharatKosha